बदरुद्दीन से जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बने तक के कहानी

बदरुद्दीन से जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बने तक के कहानी

भारत के इतिहास में अकबर के नाम बहुत खास स्थान राखेला। मुगल वंश के ए शासक के शासन के कुछ लोग खास महत्व के संगे याद रखेले। एही अकबर के पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर रहे। उनुकर जन्म 15 अक्टूबर 1542 के भईल रहे। बचपन में 'बदरुद्दीन' कहाए वाला अकबर के नाम 'जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर' 1546 ई. में खतना के मौका प उनुकर पिता हुमायूँ रखले रहन।

मात्र तेरह साल के उमर में अपना पिता के मरला के बाद दिल्ली के राजगद्दी प बईठे वाला बादशाह अकबर एकमात्र अयीसन मुगल बादशाह रहले जेकरा के हिन्दू अवुरी मुस्लमान के बराबर प्यार अवुरी सम्मान मिलल। उ हिन्दू-मुस्लमान संप्रदाय के बीच के दूरी कम करे खातिर 'दीन-ए-इलाही' नाम के धर्म के स्थापना कईले।

अकबर के दरबार हमेशा सभका खातिर खुलल रहत रहे। उनुका दरबार में मुस्लमान के मुक़ाबला हिन्दू सरदार के गिनती जादा रहे।

नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ अवुरी हमीदा बानो के संतान, अकबर के बाबा के नाम जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर रहे। अकबर के जन्म के समय हुमायूँ के हालत अयीसन ना रहे कि उ अपना बेटा के जन्म प अपना सगा-संबंधी संगे कवनो जश्न मनावस चाहे उपहार देस।

हुमायूँ के शासन करता मुश्किल से नव साल भईल रहे कि 26 जून, 1539 के गंगा के किनारे 'चउसा' (जिला, शाहाबाद (बक्सर) बिहार) में शेरख़ाँ (शेरशाह) से हार गईले। चउसा के हार के बाद कन्नौज में हुमायूँ के एक बेर फेर अपना किस्मत के आजमावे के मौका मिलल।

लेकिन शेरशाह 17 मई, 1740 के फिर एक बेर अपना से कई गुना अधिका सेना वाला हुमायूँ के हरा देले। एह हार के बाद हुमायूँ के पश्चिम के ओर भागे के परल। बहुत दिन तक उ राजस्थान के रेगिस्तान में भटकत रहले, लेकिन कतही से उनुका के केहु के मदद ना मिलल। एही बीच उनुकर मुलाक़ात हमीदा बानो से भईल अवुरी 14 साल के हमीदा के बियाह हुमायूँ से हो गईल।

हुमायूँ, शेरशाह से मिलल हार के बावजूद हार ना मनले अवुरी लगातार अपना राज्य के पावे खातिर कोशिश कर रह गईले। एही बीच उनुका मन में विचार आईल कि हो सकता कि ईरान के तहमास्प से सहायता मिल सके। मन में ए विचार के संगे उ कंधार के ओर चल दिहले। बाड़ा मुश्किल से उ सेहवान, सिंध, बलोचिस्तान के रास्ता से क्वेटा के दक्षिण में मस्तंग नाम के एगो जगह प पहुँचले।

ओह समय उहाँ हुमायूँ के छोट भाई अस्करी हुकूमत करत रहे। एने हुमायूँ के ख़बर मिलल कि, अस्करी हमला क के उनुका के पकड़ल चाहत बाड़े। हुमायूँ के भीरी मुक़ाबला करे खातिर सेना ना रहे। तनिका सा देरी कईल बहुते भारी पर सकत रहे।

हुमायूँ तुरंत घोड़ा प सवार भईले अवुरी पीछा हमीदा बानो के बईठा, पहाड़ के ओर भाग गईले। हुमायूँ अपना एक साल के बच्चा तक के अपना संगे लेबे ना पवले। उनुका जाते अस्करी दु हज़ार सैनिक के संगे पहुँचल, लेकिन उहाँ खाली अपना भतीजा के देख शांत हो गईल।

अस्करी अपना भतीजा के कवनो नुकसान ना पहुंचवलस अवुरी ओकरा के सुरक्षित कंधार ले गईल। कंधार पहुँच के अस्करी के आदेश प ए बालक के अस्करी पत्नी सुल्तान बेगम के सौंप दिहल गईल।

उहे छोट बच्चा बाद में अकबर के नाम से मशहूर भईल अवुरी भारत के इतिहास में 'अकबर महान' कहाईल।

अपना चाची के देखभाल में अकबर बड़ होखे लगले। ख़ानदानी चलन के मुताबीक अनगा नाम के एगो महिला के अकबर के दूधमाता बनावल गईल। समय के संगे हुमायूँ अवुरी उनुकर भाई अस्करी के बीच के दुश्मनी खतम हो गईल अवुरी दुनो भाई एके संगे रहे लगले।

अकबर जब तनिका बड़ भईले त ओ समय के रीवाज़ के मुताबीक चार साल, चार महीना अवुरी चार दिन प अकबर के पढ़ावे खातिर मुल्ला असामुद्दीन इब्राहीम के शिक्षक बनावल गईल। लेकिन अकबर के पढ़े में मन ना लागत रहे। हुमायूँ के जब मालूम भईल की अकबर के पढ़े में ना बलुक कबूतर बाजी में मन लागता त उ परेशान हो गईले अवुरी मुल्ला बायजीद के अकबर के शिक्षक के रूप में लगा दिहले।

एकरो से कवनो फायदा ना भईल। अकबर के कबूतर बाजी अवुरी कुकुर के संगे खेले से फुर्सत मिले तब नु पढ़ाई-लिखई प ध्यान देस। अकबर के मातृभाषा होखला के चलते फ़ारसी निमन से बोले-चाले आ गईल रहे लेकिन लिखे के नाम प अंगूठा छाप रह गईले।

अकबर के मात्र 9 साल के उम्र में पहीला बेर 1551 ई. में गजनी के सूबेदारी सौंपल गईल। सिकन्दर सूर से अकबर जब 'सरहिन्द' के छीन लेले त 1555 ई. में हुमायूँ अकबर के आपन 'युवराज' घोषित क दिईले।

जब हुमायूँ दिल्ली प फिर से अधिकार क लेले त अकबर के लाहौर के गर्वनर बनवाल गईल। ओ समय अकबर के संरक्षक के रूप में तुर्क सेनापति बैरम ख़ाँ के नियुक्ति भईल।

एक बेर फेर हुमायूँ के दिल्ली के गद्दी रास ना आईल अवुरी जनवरी, 1556 में दिल्ली के 'दीनपनाह' भवन में सीढ़ी से गिरला चलते उनुकर मौत हो गईल। हुमायूँ के मरला के खबर सुन के बैरम ख़ाँ गुरुदासपुर के नजदीक कलानौर में 14 फ़रवरी 1556 के अकबर के ताजपोशी करवा दिहले। राज्याभिषेक के समय अकबर के उम्र मात्र 13 साल रहे।

बादशाह बनला के बाद अकबर, दिल्ली के शासन के ज़िम्मेदारी बैग खान के सौंप दिहले अवुरी अपना राज्य के विस्तार में जुट गईले। अकबर के वीरता के हल्ला ओ समय अयीसन रहे कि कुछ प्रदेश के राजा त अकबर के पहुंचे से पहीलही समर्पण क देले।

एने, अकबर के गैरहाजिरी में हेमू विक्रमादित्य, दिल्ली अवुरी आगरा प आक्रमण क विजय हासिल क लेले। एक बेर फिर मुगल वंश के हाथ से दिल्ली निकल गईल रहे, जबकि 6 अक्तूबर 1556 में हेमु अपना के भारत के महाराजा घोषित क दिहले। हेमू के दिल्ली के महराजा घोषित करते एक बेर फेर दिल्ली में हिंदू राजा के राज हो गईल रहे।

दिल्ली में हार के खबर जब समाचार अकबर के मिलल त उ बैरम खान से राय-सलाह लेके दिल्ली के ओर चले के मन बनवले। अकबर के सलाहकार उनुका के फिर एक बेर काबुल के शरण में जाए के सलाह दिहले। अकबर अवुरी हेमु के सेना के बीच पानीपत में युद्ध भईल। एही युद्ध के पानीपत के द्वितीय युद्ध के नाम से जानल जाला।

अकबर के भीरी सैनिक कम होखला के वावजूद उ हेमू के खिलाफ विजय हासिल कईले। एह विजय में अकबर के 1500 हाथी मिलल जवन कि मनकोट के हमला में सिकंदर शाह सूरी के विरुद्ध काम आईल। सिकंदर शाह सूरी अकबर के सोझा आत्मसमर्पण क दिहले त अकबर उनुका के प्राणदान दे दिहले।

एही बीच बैरम ख़ाँ, हुमायूँ के भगिनी (भांजी) सलीमा बेगम से बियाह क लेले।

अकबर जब 18 साल के भईले त उनुका बैरम ख़ाँ के हाथ के कठपुतली बन के रहल बहुत अखड़े लागल। ओने बैरम ख़ाँ अपना आप के सर्वेसर्वा बना लेले रहे। जेकरा चलते दुश्मन के संख्या बढ़ गईल रहे। एक बेर अकबर बैरम खाँ के दरबार में बोलवले अवुरी कहले कि "ख़ानबाबा अब तीन गो रास्ता बाचल बा ..... जवन तहरा पसंद होखे चुन ल। पहीला, राजकाज चाहत बाड़ त चँदेरी अवुरी कालपी के ज़िला ले ल अवुरी उहाँ जाके हुकूमत कर। दूसरा, दरबारी रहल पसंद होखे त हमरा भीरी रह तहरा के तहार दर्जा अवुरी सम्मान पहीले जईसन मिली। तिसरा, अगर हज प गईल चाहत बाड़ त ओकर इंतजाम क दिहल जाई।"

बैरम खाँ बहुत निमन से अकबर के जानत रहन अवुरी तीसरा रास्ता के चुनत हज प गईल चहले।

हज प जाये खातिर, बैरम खाँ जब जहाज़ पकड़े खातिर पाटन (गुजरात) पहुँचले अवुरी जहाज़ प सवार हो आगे बढ़त रहन कि राह में उनुकर हत्या हो गईल। बैरम ख़ाँ के बेटा ओह समय चार साल के रहे। जब अकबर के बैरम खाँ के मौत के खबर मिलल त उ बैरम के बीबी अवुरी बच्चा के अपना भीरी बोला लेले।

बैरम खाँ के मरला के बाद सलीमा बेगम (बैरम खाँ के बीबी अवुरी अकबर के फुआ के बेटी सलीमा) से अकबर बियाह क लेले।

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