अंग्रेज भाग्यशाली रहले कि 1857 में कुंवर सिंह के उमर 40 साल ना रहे

आज़ादी के पहिला लड़ाई, 1857 के संग्राम के महानायक वीर कुंवर सिंह।

आज़ादी के पहिला लड़ाई, 1857 के संग्राम के महानायक वीर कुंवर सिंह।

जॉर्ज ट्रिविलियन नाम के एगो अंग्रेज इतिहासकार 1864 में अपना किताब में 'द कम्पटीशन वाला (The Competition Wallah)' 1857 के विद्रोह में बाबू कुंवर सिंह के भूमिका के चर्चा करत लिखलस कि – "कुंवर सिंह, जे हमनी (ईस्ट इंडिया कंपनी) के 80 साल के उम्र में हार के मुंह देखा देले, जे अपना सेना के आरा से लेके लखनऊ तक नेतृत्व कईलन अवुरी अईसन लड़ाई लड़ले, जेकरा से अंत में भारत के भाग्य के फैसला भईल। हमनी के बहुत भाग्यशाली रहनी कि तब कुंवर सिंह के उमर 40 साल ना रहे।"

अईसे त कुंवर सिंह के वीरता खाती कवनो प्रमाण के जरूरत नईखे लेकिन जब जॉर्ज ट्रिविलियन जईसन लोग अईसन बात कहतारे त कुंवर सिंह के वीरता के गूंज के अनदेखी कईल अपना से बेईमानी कईल होई।

दुनिया के इतिहास में कुंवर सिंह के अलावे दोसर कवनो प्रमाण नईखे मिलत, जवना में केहू 80 साल के उमर में अइसन जबर्दस्त लड़ाई लड़ले होखे अवुरी अपना औकात अवुरी इन्तजाम से कई गुना ज्यादा क्षेत्र में जीत पवले होखे।

आज के बिहार में गदर के सरताज कुंवर सिंह शाहाबाद जिला (अब भोजपुर) के एगो रियासत जगदीशपुर के जमींदार रहले। बचपन से फक्कड़ अवुरी मनमौजी स्वभाव के कुंवर सिंह के जादा समय शिकार खेले अवुरी रासरंग में बीतल रहे।

राजकाज से बेपरवाह अवुरी मनशोख होखला के चलते भाई-बाप समेत अपना पत्नी तक से ठनल रहत रहे। घुड़सवारी, तीरंदाज़ी अवुरी पहलवानी उनुकर प्रिय खेल रहे। कहल जाला कि इंसान के शरीर ओकरा स्वभाव के हिसाब से मिलेला। लोक कथा के अनुसार कुंवर सिंह सात फिट लंबा रहले।

कहल जाला कि बिहार में विद्रोह के अगुवाई करेवाला कुंवर सिंह दानापुर छावनी में बगावत करावे में भी मजगर भूमिका निभवले रहले। इ कहल जादा उचित होई कि कुंवर सिंह के प्रेरणा से ही दानापुर के सिपाही विद्रोह कईले रहले।

अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई में उतरे से पहिले कुंवर सिंह लड़ाई के पूरा तयारी क लेले रहले अवुरी देश भर के जमींदार, राजा-रजवाड़ा लोग के पाती पेठाके लड़ाई में शामिल होखे के न्योता भेजले रहले।

छोटे-छोटे जमींदार लड़ाई में कुंवर के साथ देवे के हामी जरूर भरले, लेकिन बिहार के कवनो बड़ जमींदार उनका संगे ना आईल। दरभंगा, टेकारी अवुरी बेतिया के त बाते छोड़ दी, कुंवर सिंह के खानदान से होखला के बावजूद डुमरांव के महाराजा तक अंग्रेजन से लड़ाई में उनुकर साथ ना देले।

सेष परान जबलें कुछऊ, लाली रहे लहू कतरे में
मैल ना लागल बाप के पाग, ना माई के दाग लागल अँचरे में
काहें ना माई गुमान करई, छिपले अस लाल जहां कचरे में
झुमत बा इतिहास जहां तहां कईसे भूगोल खतरे में॥

~ पंडित चन्द्रशेखर मिश्र

अतने ना, कुंवर सिंह के सगोत्रीय उज्जैन के राजपूत भी उनका संगे ना अईले। अजुवो बिहार के भोजपुर जिला में एगो उज्जैनिया राजपूतन के गांव में एगो बहुत बहुत बड़ पोखरा बा, जेकरा बारे में उहाँ के लोग बतावेलन कि इ पोखरा कुंवर सिंह बनवईले रहले। गाँव के लोग के बतावला के मुताबिक ए पोखरा के बनावे के पीछा कुंवर के मंशा रहे कि अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई में साथ ना देवे वाला सभ उज्जैनिया राजपूतन के मार के एही पोखरा में भर दिहल जाई।

अयीसन कठिन अवुरी मन भटका देवेवाला हालत में कुंवर सिंह अंग्रेजन से जबर्दस्त लोहा लेले अवुरी अंत तक अंग्रेज उनुका के हरावे ना पवले। जब पूरा देश अंग्रेजन के कब्जा में रहे त कुंवर सिंह के नेतृत्व में जगदीशपुर आजाद रहे।

1857 के लड़ाई से पहिले कुंवर सिंह के जमींदारी के हालत डावांडोल रहे। जगदीशपुर पईसा के अभाव में रहे। सेना अवुरी सरजाम इनिका लगे नाममात्र के रहे। एकरा ऊपर से कर्ज के बोझ रहे।

अयीसन कठिन हालत में कुंवर ओ समय के सबसे लंबा लड़ाई लड़ले, जीतले। उनुका लगे सिर्फ एक चीज़ के बेजोड़ ताकत रहे। उ चीज़ रहे - जनता के जबर्दस्त समर्थन। कहल जाए कि शाहाबाद (आज के भोजपुर, बक्सर, रोहतास आ कैमूर) के किसान, कारीगर अवुरी मजदूर के बल प कुंवर सिंह 80 साल के उम्र में अंग्रेजन के उ दिन देखा देले जेकर कल्पना तक ओ समय के लोग ना कईले रहले।

दानापुर छावनी के सिपाही अयीसे त 25 जुलाई, 1857 के विद्रोह कईले लेकिन कुंवर सिंह के पहिलही पता रहे कि दानापुर के सिपाही विद्रोह करे वाला बाड़े। छावनी के एगो सिपाही कुछ दिन पहीले बता गइल रहे कि "हमनी के बीच 'हल्दी बंटा गईल' बा अवुरी अब कबहूँ विद्रोह हो सकता।"
ए जानकारी के संगे कुंवर सिंह लड़ाई के तैयारी में जुटले अवुरी अपना सेना के पांच भाग में बाट देले। पांचो भाग के नाम रहे – 'राणा कमान', 'शिव कमान', 'टिपू कमान', 'बजरंगी कमान' अवुरी 'चंडी कमान'। कुंवर के सेना में "सलारे जंग" कहाए वाला हरेकृष्ण ए सेना के सेनापति रहले।

एही तरे कुंवर के सेना के अलग अलग ब्रिगे़ड के नाम उहाँ के गांव के नाम पर धईल रहे। शाहपुर थाना के सहजवली निवासी, देवी ओझा के कारीसाथ डिवीजन के कमान मिलल रहे। बिहियाँ डिवीजन के कमांडर गया जिला के खमदनी निवासी वीर जीवधन सिंह रहले। चौगाईं डिवीजन के कमांडर शाहपुर के रणजीत अहीर रहले।

कुंवर के सेना के खासियत रहे कि एकरा में अनगिनत लोग अवुरी टुकड़ी अपना इच्छा से शामिल रहे। आसपास के बहुत गांव के लोग अपना-अपना गांव के लोग के मिलाके छोटे-छोटे सैनिक टुकड़ी बनवले रहले अवुरी कुंवर सिंह के अगुवाई में अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई में कूद गईल रहले।

सासाराम के बड्डी गांव के चौहान राजपूत, गाजीपुर जिला के मेनदाई गांव के जमींदार जयनाथ, हेतमपुर के हरि सिंह, चातर के भंजन सिंह, बबुरा के रामेश्वर, बलुआं के तिलक सिंह, नवादा गांव के वीर द्वारिका, डेढ़गाईं के रामनारायण, बेनी छपरा के सुबेदार रामधुन सिंह, सुबेदार देवकी दुबे, गाजीपुर के रणबहादुर सिंह, आयर गांव के शोभा सिंह अवुरी उनुकर बेटा बाबू महादेव सिंह, दिलीपपुर के भोला बाबू के चारो बेटा, लक्ष्मी सिंह, काशी सिंह, आनंद सिंह राधे सिंह, करबासिन गांव के साहबजादा सिंह, उगना गांव के रूपनारायण, कुंवरा गांव के शिवपरसरन, डिलियां के श्यामबिहारी, झउवां के हरसु राय, गहमर के मेघन राय, जमानियां के इब्राहिम खां, पटना के डुमरी गांव के हुसैन मियां जईसन लोग कुंवर सिंह के अगुआई में ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ हुंकार भर चुकल रहले।

दानापुर के सातवां, आठवां अवुरी चालीसवां पलटन 25 जुलाई, 1857 के विद्रोह कईलस। ऐने कुंवर सिंह आरा शहर प कब्जा क लेले। विद्रोही आरा के सरकारी खजाना से 70 हजार रुपया लूट लेले अवुरी जेल तूर के सभ कैदी के आजाद क देले। कुंवर सिंह आरा प कब्जा के बाद शहर के कमान शेख मोहम्मद अवुरी शेख अफजल को सउप देले अवुरी आगे के तैयारी में जुट गईले।

ऐने जान बचावे खाती 'आरा हाउस' में लुकाईल अंग्रेज आरा प कब्जा के सूचना वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी के भेजले। सूचना मिलला के बाद आरा के कुंवर के कब्जा से मुक्त करावे खातिर कैप्टन डनवर दानापुर से 500 सैनिक के फौज लेके रवाना भईल।

जब अंग्रेजी फौज आरा के नजदीक कायमनगर चहुंपल त कुंवर सिंह के सैनिक ओ टुकड़ी प हमला बोल देले। बहुत बरियार लड़ाई भईल। ओह लड़ाई में डनवर समेत लगभग चार सौ सैनिक मारल गईले अवुरी आरा के कुंवर सिंह के कब्जा से मुक्त करावे में अंग्रेज नाकाम हो गईले।

एही बीच जब आरा में कुंवर के सेना जीत जश्न मानवत रहे त कलकता से इलाहाबाद जात अंग्रेज तोपखाना के सेनापति कैप्टन आयर के बक्सर में खबर मिलल कि कुंवर सिंह के नेतृत्व में विद्रोही आरा प कब्जा क लेले बाड़े। बस, अब का बाचल रहे, आयर बक्सर से लवट के आरा के ओर चल देलस। ओकरा भीरी बहुत बड़का फौज के अलावे तोपखाना भी रहे।

गजराजगंज में कुंवर सिंह अवुरी अंग्रेजी फौज के बीच बहुत मजगर लड़ाई भईल। कुंवर सिंह ए मौका प बहुत समझदारी आ सुझबुझ से काम लेले अवुरी समझ गईले कि अंग्रेज़ी तोपखाना के मुक़ाबला कईल फिलहाल मुश्किल बा। उ समझ गईले कि जदी एहिजे उनुकर सेना हार गईल त आगे के लड़ाई जीतल असंभव हो जाई। उ अंग्रेज के सोझा हार माने से बढ़िया, मोर्चा से पीछा हट जाए के फैसला कईले।

कुंवर सिंह के तर्क रहे कि गजराजगंज में अंग्रेज़ी तोपखाना के हाथे मरईला से बढ़िया बा कि इहाँ से हट दोसर जगह मोर्चा बनावल जाए। कुंवर सिंह के सेना गजराजगंज से आरा के ओर बीबीगंज में मोर्चा बनवलस। लेकिन दुर्भागय से ए लड़ाई में भी कुंवर सिंह के नाकामी मिलल।

लेकिन कुंवर हार ना मनले रहले। एक ओर कैप्टन आयर जगदीशपुर में कुंवर सिंह के किला के तोप से ढ़हवावत अवुरी जरावत आरा शहर प कब्जा कईलस त दोसरा ओर कुंवर सिंह सासाराम शहर प कब्जा क लेले।

सासाराम में कुंवर सिंह के खबर मिलल कि दानापुर के बाद अब रामगढ़ छावनी (हजारीबाग, झारखंड) में सैनिक विद्रोह हो गईल बा अवुरी विद्रोही उनुका से मिले आवतारे। लेकिन दुर्भाग्य से विद्रोही सेना चतरा में अंग्रेज सेना से हार गईल अवुरी कुंवर सिंह से मिले के इच्छा पूरा ना भईल।

सासाराम के कमान अपना छोट भाई अमर सिंह के हाथ में सउप के कुंवर सिंह कैमूर के ओर बढ़त नदी पार कईले अवुरी मिर्जापुर के करीब विजयगढ़ में पड़ाव डलले। उहाँ के लोग कुंवर के बहुत बरियार समर्थन कईले। एकरा बाद उ सिंगरोली पहुंचले अवुरी रीवा के महाराज से मदद के गोहार लगवले। रीवा महाराज मदद त ना कईले लेकिन कुंवर के अपना राज्य के सीमा से बहरी चल जाए के कह देले।

रीवा के महाराज के फरमान कुंवर सिंह के पसंद ना आईल अवुरी उ तुरंत रीवा प चढ़ाई क देले। रीवा के कायर राजा राजधानी छोड़के भाग गईल अवुरी रीवा के सिपाही कुंवर सिंह के सेना में शामिल हो गईले। रीवा के रेजिडेंट कमांडर कर्नल हिंडे, कुंवर सिंह के विरोध में मैदान में आईल लेकिन उ बागी फौज के सोझा ढेर देरी ना टीके सकल।

अईली भदउवा केरी राति-सघन घन घोरी रहे
बाबू चढलीं रयनि आधिराती, फिरंगी दल कांपि रहे
तनवा से गिरे झरि झरि धार तुपक रन गोली झरे
बाबू के घोड़ा करै काटि कटक गोरा काटि रहे॥

~ दुर्गाशंकर सिंह

कुंवर सिंह रीवा के शासन अली अवुरी राय के जिम्मा लगा के अपने बांदा के ओर बढ़े लगले लेकिन बांदा के नवाब भी उनुकर साथ ना देले। एकरा बाद कुंवर कालपी के ओर चलले। एही बीच कुंवर के एगो चिट्ठी मिलल। चिठ्ठी में नाना साहेब, तांत्या टोपे अवुरी लक्ष्मीबाई के संगे मिलिके आगे के योजना बनावे के कहल रहे। लेकिन ए तीनों लोग के अंग्रेजी सेना राह में घेर लेलस। एहसे इ बैठक ना होखे पावल।

कुंवर सिंह उहाँ से आपन सेना लेके निकले वाला रहले कि अंग्रेजन के तोप आग बरसावे लागल। कुंवर सिंह के सेना भी अंग्रेजन से जमके मुक़ाबला कईलस। एही लड़ाई में कुंवर सिंह के पोता दलभंजन सिंह वीर गति के प्राप्त भईले।

एकरा बाद कुंवर सिंह अपना सेना के कानपुर के ओर कूच करे के आदेश देले। राह में ग्वालियर के चालीसवां पैदल सेना के बागी सिपाही कुंवर सिंह से मिल गईले। कानपुर के नजदीक 'जहार निशां' में गुलाब सिंह के भतीजा बंदी रहले। कुंवर सिंह उनुका के आजाद करवले अवुरी लखनऊ पहुंच गईले। लखनऊ के नवाब कुंवर सिंह के दिल खोलके स्वागत कईले।

लखनऊ के नवाब कुंवर सिंह के बारह हजार नगद रुपया अवुरी आजमगढ़ प शासन करे के अधिकार देले। कुंवर सिंह आजमगढ़ के अपना कब्जा में लेके भोजपुर (जगदीशपुर) लवटे के तैयारी करे लगले। अंग्रेजन से लड़त-भिड़त अवुरी ओकनी के छकावत कुंवर सिंह शिवपुर के गंगा घाट प चहुंपले आ इहें से गंगा पार करे के फैसला कईले।

सेनापति अवुरी सैनिक के लाख निहोरा के बावजूद कुंवर सिह पहिले नदी पार करे प तयार ना भईले। पहीले उ अपना फौज के गंगा पार करे के आदेश देले अवुरी अपने सबसे बाद में पार करे के फैसला कईले।

जब नाव अंतिम खेप लेके चलल त कुंवर सिंह अपने एगो हाथी पर सवार होके गंगा पार करे लगले। ठीक ओही घरी, शिवपुर घाट के पछिम से डगलस आ लुगार्ड के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज चहुंप गईल। कर्नल चैंबरलेन मद्रासी घुड़सवार सेना लेके उहा पहुंचल।

अब कुछ ना हो सकत रहें, बाबू साहेब के फौज त पहिलही गंगा पार कर चुकल रहे अवुरी अपनहूँ उ आधा गंगा पार कर लेले रहले। अंग्रेजी फौज गंगा पार करत कुंवर के सैनिकन पर गोली बरसावे लागल। सैनिक जवाबी गोलीबारी करे लगले। एही गोलीबारी में एगो गोली कुंवर सिंह के बायाँ बांह में लागल।

भोजपुरिया माटी के शेर के बांह में गोली लागल रहे लेकिन हिम्मत में अभी कवनो छेद ना भईल रहे। कुंवर तलवार निकलले अवुरी अपने हाथ से अपना बायाँ बांह के काट के अलग क देले आ गंगा माई से कहले "इ बांह अंग्रेजन के गोली लागे से अपवित्र हो गईल बिया , हे माई, एकरा के तू अपना पावन जल से पवित्र क द।"

भोजपुर के गांव में अजूओ ए घटना के सोहर गावल जाला अवुरी कुछ ए प्रकार से बतावल जाला –

लाख-लाख गोरवन के मारेलन, त मारी के खदेरेलन हो,
ललना तनीआसा अंखिया बिछुली गइले, बंहियां में गोली खइले हो।
गोलिया जे लागे जइसे फूल बरसे, हंसेलन कुंवर सिंह हो,
ललना सेहू बंहियां काटी तरुवरिया त गंगा में अरपी दिहले हो॥

शिवपुर घाट प लड़ाई के संगे कुंवर सिंह 23 अप्रैल, 1858 के जगदीशपुर के नजदीक अपना जीवन के अंतिम लड़ाई लडले अवुरी जगदीशपुर के किला से अंग्रेज़ी झण्डा 'यूनियन जैक' के उतार फेंकले आ ईस्ट इंडिया कंपनी के सेना के पूरा तरीका से भागा देले। किला प कब्जा करे के लड़ाई में कुंवर सिंह के बहुत गंभीर चोट पहुंचल रहे अवुरी किला प कब्जा कईला के तीन दिन बाद 26 अप्रैल , 1858 के जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह ए दुनिया के हमेशा खाती त्याग देले।

लेकिन ए क्षण में कुंवर सिंह के मन में सतोष रहे कि उनुकर जगदीशपुर अंग्रेज के कब्जा से मुक्त बा अवुरी आज़ाद बा।

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