हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका के दहन बिहार के धरती प भईल रहे

हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका के दहन बिहार के धरती प भईल रहे

महान पर्व होली के एक दिन पहिले होलिका दहन होखेला। होलिका दहन बुराई प अच्छाई के जीत के देखावेला लेकिन बहुत कम लोग के मालूम होई कि हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका के दहन बिहार के धरती प भइल रहे। पुरनिया लोग के मुताबिक, हिरण्यकश्यप के बहिन होलिका के दहन के बाद से हर साल होलिका दहन के परंपरा के शुरु भईल।

बिहार के पूर्णिया जिला के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में उ जगह बा, जहवां होलिका भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के अपना गोदी में लेके धधकत आग मे बइठल रहली। एह घटना के बाद भगवान नरसिंह के अवतार भइल अऊरी उहे (नरसिंह भगवान) हिरण्यकश्यप के वध कइले।

पौराणिक कथा के मुताबिक, सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्यप के किला रहे, जहां भक्त प्रह्लाद के रक्षा खातिर एगो खंभा में से भगवान नरसिंह अवतार लिहले रहले। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ल खंभा (माणिक्य स्तंभ) अजूओ मौजूद बा। कहल जाता कि एह खंभ के बहुत बेर तुरे के प्रयास कइल गइल, लेकिन इ खंभा झुकल त ना, टूटल त दूर के बात बा।

पूर्णिया जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर सिकलीगढ़ के बुजुर्ग लोग के कहनाम बा कि प्राचीन काल में 400 एकड़ जमीन में बहुत छोट-बड़ पहाड़ी टीला रहे, जवन कि अब मात्र 100 एकड़ के करीब में रह गईल बा। कुछ दिन पहिले एह टीला के खुदाई में कुछ पुरान समान निकलल रहे।

धार्मिक पत्रिका "कल्याण" के 31वां साल के विशेषांक में सिकलीगढ़ के खास उल्लेख करत एह जगह के नरसिंह भगवान के अवतार स्थल बतावल बा।

बनमनखी अनुमंडल के पूर्व अनुमंडल पदाधिकारी केशवर सिंह एह बारे में बतवले कि, ए जगह के होलिका से जोड़े खाती बहुत प्रकार के प्रमाण मौजूद बा। उ कहले कि एही जगह हिरन नाम के नदी बहत रहे। केशवर सिंह बतवले कि, कुछ साल पहिले तक नरसिंह स्तंभ में एगो छेद रहे, जवना में ढेला डालला प उ हिरन नदी में पहुंच जात रहे। एही जगह प भीमेश्वर महादेव के बहुत विशाल मंदिर भी मौजूद बा।

मान्यता के मुताबिक हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष बराह क्षेत्र के राजा रहले जवन कि अब नेपाल में पड़ेला।

प्रह्लाद स्तंभ के देखरेख खातिर बनल 'प्रह्लाद स्तंभ विकास ट्रस्ट' के अध्यक्ष बद्री प्रसाद साह बतवले कि भागवत पुराण (सप्तम स्कंध के अष्टम अध्याय) में माणिक्य स्तंभ स्थल के चर्चा बा। बद्री प्रसाद के मुताबिक, भागवत पुराण में कहल बा कि एही खंभा में से भगवान विष्णु, नरसिंह अवतार लिहले आ अपना भक्त प्रह्लाद के रक्षा कइले।

एह जगह के एगो खास विशेषता बा कि, इहां राख अऊरी माटी से होली खेलल जाला। सिकलीगढ़ निवासी मनोहर कुमार बतवले कि, मान्यता बा कि जब होलिका भस्म हो गईल रहली आ प्रह्लाद धधकत आग से सकुशल वापस आ गईल रहले, तब प्रहलाद के समर्थक ए आग से निकलल राख़ के एक-दोसरा के लगा के खुशी मनवले रहले, आ तबे से होलिका दहन के परंपरा शुरू भइल।

कुमार कहले कि इहां होलिका दहन के दिन पूरा जिला के अलावे दूर-दूर से करीब 50 हजार श्रद्धालु जुटेले अऊरी जमके राख-माटी से होली खेलेले। उ कहले इहाँ से शुरू राख़-माटी के होली के जवन परंपरा शुरू भईल ओकर पसार लगभग पूरा बिहार अवुरी पूर्वी उत्तर प्रदेश तक भईल अवुरी एकरे चलते आजो होली के शुरुआत राख अऊरी माटी से होखेला।

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