महतारी के बात ना मनला के साजा, जान आफत में परल त बुझाईल

महतारी के बात ना मनला के साजा, जान आफत में परल त बुझाईल

एगो गांव मे तालाब के किनारे एगो हंस रहत रहे। ओह हंस के दुगो बच्चा रहे, जवना में से एक के नाम हनी आ दुसरका के नाम मनी रहे। हंस के इ दुनो बच्चा बहुत बदमाश रहले लेकिन, ए दुनो में से मनी जवना के नाम रहे उ ढेरे ढीठ रहे। मनी आपन माई के एको कहल बात ना मानत रहे।

एक दिन हनी आ मनी, दुनो देखेले की ठीक तालाब के बीच में कुछ रंगीन फूल फुलाईल बा। ओ फूल में से कवनो फूल लाल रहे त कवनो पिअर। हनी कहलस कि, हम लाल लेब त मनी कहलस कि हम पिअर लेब। दुनो अपने मे हारा-तुजी करत फूल लेबे चल दिहले। दुनो के तालाब मे जात देख, हनी-मनी के माई जोर से चीलाईल, कहलस – "अरे ये हनी-मनी ओने मत जा’स, ओने जान के खतरा बा।"

ओह दिन त दुनो अपना माई के बात मान गईले अवुरी बीच तालाब में ना गईले। लेकिन मनी नाम के जवन बचवा रहे ओकरा मन में फूल खाती लालच रहे, ओकर मन फूल खाती ललचत रहे। उ दुसरका दिन चुपके से तालाब मे फूल तूरे चल देलस।

एने एगो बहेलिया पहिलही से ए इंतजार में बईठल रहे कि कब कवनो आवे की ओकरा के हम ध लिही।

जसही मनी तालाब के बीच में पहुंचल कि बहेलिया झट से ओकर गर्दन ध लेलस। गर्दन धरात भईल कि मनी जोर-जोर से चिलाए लागल, मनी के आवाज सुन ओकर माई आ भाई दुनो दउरल अईले आ बहेलिया के अपना चोंच से मारे लगले। दुनो अपना चोंच से मार-मार के बहेलिया के घवाही क देलस।

बहेलिया आपन जान बचावे खातिर विनती करे लागल आ कहलस कि, "अब हम केहु के ना पकड़ब, हमरा के छोड़ द लोग।" केहु तरे बहेलिया आपन जान बचा के तालाब में से भागल, ऐने हंस आपन दुनो बच्चा के सही सलामत लेके अपना घरे लवट आईल। ए घटना के बाद से मनी भी आपन माई के बात माने लागल।

ऐही से कहल जाला कि अपना से बड़ लोग के बात जरूर माने के चाही, काहें से कि अपना से उमर मे बड़ लोग के भीरी जिनगी के अनुभव भी ढेर होखेला। जेतना जिनगी जियब ओतने अनुभव ढेर होई।

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