मर्द: बियाह होखते बेचारा के नाम अवरु उपाधि बढ़त जाला

औरत जात प त हरमेशा कुछ ना कुछ लिखाला। आज हम सोचनी ह कि मर्द के दर्द प कुछ लिखल जाय। औरत जात के त केहू बेचारी कह देला। बाकिर मर्द लोग के भी हालत बेचारा से कम नईखे। उहो ओह मर्द के जेकर बियाह भ गईल होखे।

इ त सभ केहू कहेला कि बियाह भईला के बाद औरत के जिनगी एकदम बदल जाला। लेकिन इ केहू ना कहे कि, मर्द के भी जिनगी पूरा तरह से बदल जाला। संच त इहे बा कि मर्द के बियाह होखला के बाद से पूरा तरह से जिनगी में बदलाव आ जाला। बियाह भईला के बाद चैन से काहां रह पावेला लोग!

पहीला शब्द त माई कहेली, “बियाह होखते बबुआ त एकदमें बदल गईले। बबुआ के त माई अब यादे नईखे रहत। जब देख तब मेहरारू के लगे बईठल रहतारे। आरे, तनी बहरियों निकलल कर। का 'मेहर मउग' निहन दिनभर घर में घुसियाईल रहतारे”।

अब देखी बियाह भईल त एगो नाया नाम मिलल नु, 'मेहर मउग'। अभी आगे-आगे देखत जाई कवन-कवन नाम पराता।

इहे बबुआ अगर मेहरी भीरी ना बईठस, त लोग कहिहे की मेहरी के त इ पूछते नईखे। लागता कि ओकरा पसन नईखे”।

भीरी बईठे त मेहर मउग', ना बईठे त पूछते नईखे।

अब एह हालत में त मर्द के हालत साँप-छुछुंदर निहन भ गईल नु? अब बतायीं मर्द बेचरा भईल कि ना?

मर्द बेचारा शरीफ बन के रहे त सभ ओकरा शराफात के फ़ायदा उठावे लागेला, आ खिसियाए त 'बेलुरा' के नाम पर जाला। देखी लोगे एगो अवरू नाम मिलल नु 'बेलुरा'।

मर्द घर में ढेर रहे त कहाला - “मार मेहरारू निहन घरही रहेला। आ घर से बहरी घूमे त कहाला कि, ये मार हो उ त बड़का 'आवारा' ह, जब देख तब घर से बहरे घुमत रहेला। देखनी जा नु, मिल गईल नु 'आवारा’ के उपाधि।

जईसे एगो औरत दोसरा औरत के बुराई करेले, ओकरा में कमी निकाले के मौका खोजत रहेले, ओही तरे मर्द जात भी एक दोसरा में कमी निकाले के तलाश में रहेला। कवनों मर्द, अपने त घन-टन अपना मेहरारू भा भउजाई से बतीअइहे, बाकि दोसरका बतियाई त कहिहे मार 'साला' के मेहरारुने में ढुकल रहेला।

अब देखी उ मर्द उनकर 'साला' ना ह, बाकि 'साला' कह देले नु। त एह तरे एगो अवरू नाम में बढ़ गइल।

अगर मर्द नौकरी करतारे आ ऑफिस में लईकिन से दु-चार दिन लगातार बतिया लिहले त उनकर जियल मुश्किल हो जाला, सभ उनका के शक के नजर से देखे लागेला। उनकर बतियावल एगो चर्चा के विषय बन जाला। आरे इ त बड़का 'कमीना' बाटे। इ त लईकिन से बतियावता। ल फिरु एक बेर नाम में तरक्की भ गईल।

बेचारा मर्द बियाह भईला के बाद सबसे पहिले अपना मन के इच्छा के मारेला। बेचारा करबो करे त का करे?

मेहरारू के काम में मदद करे त 'जोरू के गुलाम', ना करे त 'निकम्मा'। बेचारा मर्द के मन के केहु समझे के कोशिश ना करेला। औरत के जब कवनों दुख तकलीफ होई, त उ रो-रो के माई बहीन भा केहू से कही, मन हलुक क लीही। बाकि मर्द अईसन ना करे। उ त केहू से आपन तकलीफ ना बतावल चाहे, उ आपन कष्ट अपने दूर करे के कोशिश करेला।

बियाह भईला के बाद मर्द, माई अवरू मेहरारू के बीच में गेहूं में घून निहन पीसा जाला। दुनों के बरियारी में उ बेचारा बन जाला। केहू इ जाने के कोशिश कईले बा कि, एतना सभ नाम अवरू उपाधि मिलला के बाद मर्द के कईसन लागेला? का ओकरा आँख से लोर ना गिरत होई?

लोर गिरे ला बाकि केहू देखल ना चाहे, काहे से कि ‘मर्द’ ह भाई। "मर्द के दर्द काहां होखेला"।

अतना सभ होखला के बावजूद सभ लोग मर्द से ही अपेक्षा बनवले रहेले। समाज अवरू घर गृहस्थी के बोझा ढ़ोअत कब काहां अपना-आप के उ भुला देला, खुद ओकरा भी पता न चलेला। ओकरा अपना पसंद ना पसंद के भी ख्याल ना रह जाला। अतना सभ होखला के बाद भी मर्द ही घर के मुखिया होखेले अवरू सभके पोसे पाले के जिम्मेवारी खुशी-खुशी उठावेले।

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