कउवा के खूब घमंड रहे, लेकिन ओकर घमंड भरल सभा में चूर हो गईल

घमंड त आदमी के खा जाला। घमंडी आदमी कबो सफल ना होखे पावस, आ ना उनका येह संसार में केहू से भरपूर प्यार-दुलार मिल पावेला। हम येही घमंड प एगो कउआ (कौआ) अवरू हंस के कहानी सुनावत बानी।

एक बेर एगो हंस के टोली समुंदर के किनारा-किनारा जात रहे। ओही जगह प एगो कउआ भी मस्ती करत रहे। कउआ में बाड़ा घमंड रहे। उ अपना आगा केहू के कुछूओ ना समझत रहे।

ओह दिन जब कउआ हंस के झुंड देखलस त मजाक उड़ावत कहलस कि, तोहन लोग केतना बढ़िया से उड़त बाड़ लोग, आ उड़ला के अलावे अवरू का करिए का सकता’र लोग, बस फांख फईला के फर-फर उड़ लेबे के बा। अवरू कुछ त तोहन लोग के आवे ना! का तू लोग हमरा निहन खूब तेजी से उड़ सकत बाड़ लोगिन? हमरा निहन करतब तोहन लोग के करे आई?

आगे कहलस, अरे हम त बेकार में तोहन जना से बोलतानी, भला तोहन लोग के ई कईसे करे आई! तोहन लोग त खाली फांख फड़फड़ा के उड़े जाने ल जा। तोहन लोग का जनले कि आखिर उड़ल का कहाला?

हंस मे जवन सभले बुढ़ रहे, उ ध्यान से कउआ के बात सुनलस आ कहलस - सुन के बहुत खुशी भईल कि तोहरा बहुत कुछ करे आवेला बाकि येह प तू घमंड जन कर। घमंड त बढ़िया-बढ़िया आदमी के नाश क देला, तू त कउआ हवे!

हंस के बात सुन कउआ खिसिया के बोललस, 'हम घमंड-फंड ना जानीला। अगर तोहन लोग में से केहू हमार मुक़ाबला क सकता, त हमरा सोझा आवे, आ हमरा के हारा के देखावे’

कउआ के ललकार सुन हंस ओकरा संगे लड़े के तैयार भईले। एगो हंस आगे आईल आ कहलस कि, अपना प एतना घमंड कईल बढ़िया नईखे। हम तोहार चुनौती स्वीकार करतानी, बोल का करे के बा?

कउआ आ हंस के झुंड के सहमति से प्रतियोगीता तय भईल, आ तय भईल कि प्रतियोगिता दु बेर में होई। पहीला बेर में कउआ आपन करतब देखाई आ जईसे-जईसे उ करी ठीक ओही तरे हंस के करे के पड़ी।

प्रतियोगिता शुरू भईल, कउआ आपन एक से बढ़ के एक करतब देखावे लागल। कबो जमीन के छुअत ऊपर उड़ जाय, त कबो गोल-गोल घूमे लागे। जब हंस ओकरा निहन ना करे पवले त कउआ मजाक उड़ावे लागल।

कउआ कहलस, हम त पहीलही कहत रही कि तोहन लोग के कुछूओ ना करे आई

अब हंस के बारी आईल। अबकी बेर के नियम रहे कि, पहिले हंस आपन करतब देखाई ओकरा बाद ओकर हूबहू नकल कउआ करी।

हंस आपन उड़ान भरलस आ एकदम सीधा समुंदर के ओर उड़ल। कउआ, हंस के पीछा-पीछा उड़े लागल। हंस के सीधा उड़त देख कउआ कहलस ई कवन उड़ान हटे, सीधा-सीधा। ईहो उड़ान भला कवनों उड़ान हटे। अब हमरा बुझा गईल तू बड़ाका बुरबक बाड़े

कउआ के बात के अनसुना करत, हंस चुपचाप उड़त रहे। हंस उड़त-उड़त जमीन से बहुत ऊपर चल गईल, एने हंस संगे उड़त कउआ के हालत खराब भ गईल रहे। अब कउआ के बक-बक तक बंद हो गईल रहे।

कउआ अब थाक गईल रहे। अतना थाक गईल रहे कि ओकरा एको मिनट हवा में रहे में मुश्किल होखत रहे। ओकर पियास से जान जात रहे। कउआ, हंस के खेल समझ गईल।

कहलस, हमरा के माफ कर, हमरा से बहुत बड़ गलती भ गईल बा। आज तू हमार आँख खोल देल। अब से हम कबो घमंड ना करब। कउआ के बात सुन हंस नीचे जमीन प आ गईल।

ओकरा अपना घमंड प बड़ा पछतावा भईल। कउआ सभ हंस से माफी मांग, उड़ के चल गईल।

एहितरे, हमनी के कबहू घमंड ना करे के चाही, काहेंकि हर इंसान में कवनों ना कवनों खूबी जरूर होखेला।

कुछ लोग आपन खूबी जान लेले त कुछ लोग जिनगी भर ना जाने पावेले। जरूरत बा अपना भीतर के खूबी के जाने के आ ओह खूबी के सही उपयोग करे के, ना कि कउआ निहन घमंड करे के। अगर कउआ निहन घमंड करे के त हमनियों के कबहु केहू के सोझा शर्मिंदा होखे के पर जाई।

त बताई, शर्मिंदा होखल निक लागी?

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