'फगुआ के मजा बा गँउवें में, कहीं चौताल त कहीं जोगीरा, कहीं गँवई सुगंध से सराबोर पुआ'

'फगुआ के मजा बा गँउवें में, कहीं चौताल त कहीं जोगीरा, कहीं गँवई सुगंध से सराबोर पुआ'

पिछिला होलिआ में घर से बार-बार फोन आवे कि 'ए बाबू तू लइकन के ले के घरे चली आव अउरी ए बेरी के होली तूँ गउँए मनाव।' मलिकाइनियो कहली कि घरे फगुआ मनवले ढेर दिन हो गइल बा। हम सोंचनी की हमहुँ दु-तीन बरीस से फगुआ में घरे नइखीं रहल, त काहें ना ए बेरी के फगुआ घरवे मनावल जाव।

हम चार परानी मतलब मरदे, मेहरारू अउरी दुनु लइका फगुआ के दु-चार दिन पहिलहीं घरे पहुँची गइनी जाँ।

जहिआ समती फुँकाए के रहे ओही दिन सबेरे माई मलिया में बुकुआ अउरी कड़ू के तेल ले के अंगना में बइठी गइल अउरी लागली हाँक लगावे, "ए बड़को! ए मझिलो। काहाँ बाड़ु जा हो? लइकवन कुली के भेज जा, बुकुआ लगा दीं।"

भउजी आके माई से कहली, "ए अम्माजी! लइका सब दुआरे खेलताने। हम पानी चलवले बानी। बैठाइनियो अबहिन ले नाहीं अइली। पहिले चलीं हम रउआ के बुकुआ लगा दे तानी अउरी ओकरी बाद रउआँ नहा लीं। जब लइकवा अइहे त मझिलो चाहें हम बुकुआ लगा देइब।" तवले कहीं हम दुआरे से अइनी।

हमके देखते माई हाँक लगवलसी, "ए मझिलू! अइब, तनी तोहके बुकुआ लगा लीं। तहके बुकुआ लगवले केतना दिन हो गइल।" हमरा से रहाइल नाहीं अउरी हम छछाके, धाधाके माई की लगे पहुँचि के लगनी बुकुआ लगवावे। ओ बुकुआ की बहाने तS हमरा माई के दुलार पावे के रहे।

माई बुकुआ लगावति रहे अउरी हमरा से बतिआवतो रहे। माई कहलसी, "ए मझिलू। तूँ केतना दुबरा गइल बाड़ हो। हड्डी-हड्डी लउकताS।" हम मनहीं में सोंचनी की लइका केतनो मोटाइल होखो पर माई की नजर में उS दुबराइले रही। लइका केतनो खइले होखे पर माई की नजर में उS हरदम भुखाइले रही। धनी हउS ए माई। हम माई के बाती अनसुना की तरे कS के पुछनी, "ए माई! समती की दिने बुकुआ काहें लगावल जाला रे?"

माई भोलापन से कहलसी, "ए बाबू! बुकुआ लगवले की बाद जवन देंही पर से झिल्ली (मइल) छूटेला ओमें सब रोग-बेयाधी रहेला। ओ झिल्ली के समती मइया की संघवे जरवले से सब रोग-बेयाधी जरि जाला। समती मइया सब रोग-बेयाधी ले के अपनी संघे चली जाली।"

खैर इ तS सही बाती बा की बुकुआ (उबटन) लगवले से बहुत सारा चमड़ा से संबंधित रोग ठीक हो जाला अउरी मनवो खुस हो जाला।जब घरभरी की लोग के बुकुआ लागी गइल तS सब झिल्ली (मइल) एगो कागज में रखी के अउरी दु-चारीगो गोहरा ले के हम संमती में डाली अइनीं।

साझीखान कुछु लइका चिलात अइने कुलि, "चले लइकवा समती के पतई बिटोरे हो, होS।" तवलेकहीं बाबा चिलइने, "भगबS जा की ना। एक महीना से बहुते समती के पतई बिटोरलS जा। जा-जा खापी के आव जा काँहे की 9-10 बजे समती जरावे के बा।"

समती जरवले की जुनी गाँवभर एकट्ठा हो गइल। सब लइका लुकारा बनवले रहने कुली। पंडीजी आ गइनीं। मुन्नर काका आपन नगाड़ा ले के आ गइने अउरी लगने डमडमावे। पंडीजी समती मइया की लगे कोर कलसा रखववनीं अउरी तेल-बतिहर कS के दीया जरा देहनीं। एक-आधगो मंतर बोलनीं अउरी एक आदमी समती मइया के पाँची भाँवर घुमी के आगी लगा देहल। समती मइया जरे लगली अउरी लइकाकुली लुकारा भाँजे लगने कुली।

बुढ़वा गोल ढोल, झालि ले के लागर फगुआ गावे 'हम सुमिरत पवनकुमार, अंजनी के द्वारे....' तS कहीं केहू जीगिर्रा बोलत नजर आवे, 'फागुनभर बुढ़वा देवर लागे... जोगीर्रा सररर....'।

फगुआ के मजा बा गँउवें में,
कहीं चौताल हS तS कहीं जोगीर्रा,
कहीं भउजी के पेयार हS तS
कहीं गँवई सुगंध से सराबोर माई की हाथे के बनावल पुआ।

समती जरवले की बाद सबलोग अपनी-अपनी घरे आ गइल। बिहाने पहर लइका लगने कुली कहे, "समती मइया मरि गइलीS, पुआ पका के धS गइली, हमनीजन के सुता गइली, सब केहु के खिआ गइली....।" हमनियो जान गोल बना के समती मइया की लगे गइनी जाँ अउरी उहवाँ से राखी उठा के एक-दूसरे की कपारे पर लगा के पँवलग्गी अउरी हथमिलउवल भइल, फेनु खूब गोबरउअल अउरी धुरीखेल भइल। पूरा देहीं गोबर अउरी धूरी में सना गइल रहे।

दुपहरिया में नहइले-धोवले की बाद घर-घर घुमी के फगुआ गावल चालू हो गइल। फगुहरन कुली की उपर लागल रंग अउरी अबीर बरसे। केहु पहिचान में ना आवे। जेकरी-जेकरी दुआरे पर फगुआ होखे ओकरी-ओकरी इँहा से रस चाहें बतासा चाहें लड्डू बाँटल जाव। कुछ लोग छोहारा-गढ़ी बाँटें।

हम गाँव की लोगन खातिर परदेसी रहनी ए वजह से जेकरी-जेकरी दुआरे पर जाईं, ओकरी-ओकरी दुआरे पर हमरा के खाए खातिर पुआ, जाउर आदी आवे। हमहुँ हींक लगा के दबा-दबा के खइनीं। गाँव-घर के पयार पा के अघा गइनी।

दूसरे दिने सबेरे चिखुरी बाबा की घरे पहुँचनी। उनकी दुआरे पर कोल्हू चलत रहे अउरी कुछु लइका बहरवें होरहा लगावत रहने कुलि। जब हम चिखुरी बाबा के गोर लगनी तS उ कहने बनल रहु। ए बाबू तें केकरी घर के हउए। तवलकहीं बटोरन काकीबS कहली, "पहिचानत नइखीं; टुन्ना बाबू हईं, सभापति बाबा के नाती।"

एतना सुनते चिखुरी बाबा गदगद हो गइने अउरी कहने, "आउ बाबू, आउ। बइठू, बनल रहू।" तवलेकहीं इयो (चिखुरी बाबाबS) आ गइली। हम उठी के उनहुँ के गोर लगनी।

ईया कहलीS, "होरहा खा अउरी कचरस पिअS, ए बाबू तूँ लाख बरीस जीअS।" एकरी बाद हम लइकन कुली की संघे बइठी के होरहा खइनी अउरी एक लोटा कचरस पिअनी। फगुआ के हुड़दंग अउरी गाँव के पेयार पा के हमार जियरा छछना गइल अउरी सहरिया भुला गइल।

फगुआ के आनंद अउरी उ हो गाँव में। पूछS मति काका। उ गँवई मजा अउरी दुलार कहीं ना मिली। एहि से तS हम एहु बेरि फगुआ खेले गँउवे जातानी। चलS तूँ हूँ ए काका.........होली मनावे गउवें में..........

~ प्रभाकर पाण्डेय 'गोपालपुरिया', अतिथि स्तंभकार

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