फागुन के फगुनहटा जसही बहेला, फगुआ अपने आप याद आवे लागेला

फागुन के फगुनहटा जसही बहेला, फगुआ अपने आप याद आवे लागेला

फागुन के फगुनहटा जसही बहेला, फगुआ अपने आप याद आवे लागेला, अयीसन याद कि बस मन करेला कि सभकुछ छोडछाड़ के गावें चल जईति अवरू फगुआ के रंग से सरबोर हो जईति।

होली त सभ जगह मनेला, सभ जगह करीब-करीब एके लेखा फगुआ खेललो जाला, लेकिन अपना किहें रंग के शुरुवात पंचमी के दिन से होखेला। ओह दिन सरस्वती पुजा के भसान से जवन रंग-अबीर शुरू होखेला तवन होली के दिन तक चलेला।

हमनी के गाँव में, हमनी के बेरा, फगुआ सबेरे के पानी-पांकी से शुरू होखे अवरू रंग के संगे 2 बजे तक चले, एह बीचे सभे केहु, का बुढ़, का जवान, एके रंगे के देखे में हो जात रहे। फेर नहा-धोवा के 3-4 बजे ले आदमी अबीर गुलाल ले के निकली, नाया-नाया कपड़ा पहिर के माई-बाबूजी आ अपना से बड़का के गोड़ पर अबीर लगा के असीरवाद ले के गाँव टोला में बढ़ी। हर साल इहे तरीका रही, कुछूओ नाया ना होखे पायी, लेकिन तबहुओ ओ फगुआ के आनंद आज ले मन से ना बिसरे।

बात ओह घरी के ह जब हम दिल्ली में नोकरी करे लागल रही, बाकि हर होली में गावें जरुर जात रही, ना गईला प गाँव के संघतिया 500 रूपया के जुर्माना लगा देत रहन।

ओह साल हम चार दिन पहिलही चहुँप गायिनी आ लागल पोरगराम बने कि कुछ नया कईल जाऊ, त मीटिंग में तय भईल कि कि मटका फोड़ प्रतियोगिता करावल जाऊ। इ प्रतियोगिता महाराष्ट्र में दही हांडी के नाम से जानल जाले आ अवरू कवनो ख़ास पर्व पर कईल जाला।

सब संघतियन के सहमति बन गईल आ होली के 2 दिन पहिले से परचार करवा दिहल गईल। इनाम रखाईल डेढ़ सौ रूपया। होली के दिन भोरे-भोरे, साते बजे ट्रक के बड़का रासा में मटका बन्हाइल आ एगो सड़क के दुनों ओर के पेड़ में बान्ह दियाईल। ऊंचाई रहे करीब-करीब 15 फीट।

गोल के गोल लोग आवे लागल, हमनी के बिग्रेड भी तैयार रहे, लेकिन मटकी फोरे खाती ना, मटकी फोरे आवेवाला लोग के रंग से नेहवावे खातिर। कई ड्राम रंग घोराइल रहे आ भाँग भी घोटाईल रहे। लेकिन, केहु ओ मटका के ना फोरे पावल, अंत में करीब 12 बजे हमनी के बिग्रेड के जूनियर टीम ओ मटका के फोरलस।

ओह साल के बाद 3-4 जगह अयीसन परतियोगिता के आयोजन लोग करे लगले। अब होता कि ना, कह ना सकिले। लेकिन, उ याद कर के दिल में एगो नया उमंग उठी जाला। उ याद दिल के सकून देले, अब ना त उ समय रहल ना ही उ उमंग रह गईल, अब त बस ... होली के याद..... । याद अयीसन बा कि जदी ओकर एगो कड़ी खुली त ओकरा में ना जाने कतना पन्ना लाग जायी।

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