पंचतंत्र के ज्ञान: दुश्मन प भरोसा करेवाला के बहुत बड़ कीमत चुकावे के परेला

पंचतंत्र के कहानी त हिन्दी में हमनी के बहुते पढ़ले बानी जा। आज हम सोचनी कि पंचतंत्र के एगो कहानी के भोजपुरी में अनुवाद क के पढ़ल जाय, आखिर भोजपुरी में पढला प कईसन लागता, इ अनुभव भी जरूरी बा।

एह कहानी में तनिकों बदलाव नईखे कईल गईल, लेकिन भाषा जरूर बदलल बा।पंचतंत्र के कहानी हमनी के जिनगी से जुडल बहुते बात सीखावेला, एही कड़ी में चतुर बिलार के कहानी भी बहुत महत्वपूर्ण कहानी बा। इ कहानी हमनी के बतावेले कि हमनी के आपन दुश्मन से कईसे बाँच के रहे के चाही।

कहानी के पात्र बाड़े..... चिड़िया, खरगोश अवरू बिलार ..... एगो पेड़ प चिड़िया घोसला बना के रहत रहे। एक दिन उ दाना-पानी के इंतजाम करे एगो खेत में पहुंचल। खेत में खाड़ फसल के उ खूबिए मजा से खाये लागल। उ खाये में अतना मस्त भ गईल कि राती के पेड़ प लौट के आवे के भी बात भुला गईल।

जब खेत में खईला अवरू मौज-मस्ती से मन भर गईल त ओकरा अपना घोंसला के याद आईल। याद आइल, त का रहे झट से अपना घोंसला देने चलल।ऐने सांझ के एगो खरगोश ओह पेड़ के भीरी आईल जहवां चिड़िया के घोंसला रहे। पेड़ भी छोटे रहे। ऐह से खरगोश उ घोसला में झांक के देखलस, देखलस त पता चलल कि इ घोंसला त खाली बाटे। घोंसला अतना जरूर बड़ रहे कि उ खरगोश आराम से ओह घोसला मे रह सकत रहे। खरगोश के बनल बनावल घोसला पसंद आ गईल अवरू उ ऐह घोसला में रहे के मन बना लिहलस।

कुछ दिन बाद उ चिड़ा खा-खा के मोटा ताजा बन गईल लेकिन फेर ओकरा आपन घोसला के याद आवे लागल अवरू उ लवटे के मन बना लेलस। जब लौट के आईल त देखलस कि ओह घोसला में त एगो खरगोश आराम से बईठल बाटे। खरगोश के देख के चिड़िया के बाड़ा खीस बरल।

उ खरगोश से कहलस - 'चोर कहींके, हम ना रनिहऽ, त तू हमरा घोसला में घुस गईल बाड़े? चल निकल हमरा घर से, तोहरा तनिको लाज नईखे लागत?'खरगोश शान्ति से जवाब देलस, 'काहां के तोहार घर? कईसन तोहार घर? इ त हमार घर हटे। पागल हो गईल बाड़ू तू। अरे! कुआं, तालाब भा पेड़ एक बेर छोड़ के केहु जाला, त आपन हक भी गवां देला। ऐहिजा जबले बाड़ू, तबहिए ले आपन बा आ जब छोड़ के कतही चल गईलू त ओह में केहु रह सकता। ऐह से अब इ घर हमार ह। बेकार में हमरा के तंग जन कर।'

अतना बात सुन के चिड़िया कहे लागल, 'अईसे बहस क के कुछ हासिल नईखे होखे वाला। कवनों धर्म पण्डित के भीरी चलल जाय। उ जेकरा हक़ में फैसला सुनाई ओकरा के घर मिल जाई।'ओह पेड़ के भीरी से एगो नदी बहत रहे। ओहिजा एगो बहुते बड़ बिलार बईठल रहे। ओ समय उ कवनो पाठ करत रहे। अईसे त बिलार ऐह दुनों के जन्मजात शत्रु हटे बाकि ओहिजा अवरू केहु ना रहे ऐह से चिड़िया अवरू खरगोश दुनों बिलार के भीरी जाके के न्याय के गोहार लगलवस। उ दुनों सावधानी से बिलार के भीरी जाके आपन समस्या बतवले।

आपन समस्या बतवला के बाद चिड़िया अवरू खरगोश कहले, 'हमनी के त आपन-आपन अझुरा बता देनी के, अब एकरा के सझुरावल जाए। एकर समाधान हमनी के रउआ से सुनल चाहत बानी जा। हमनी में से जे सही होई ओकरा के घोसला मिल जाई, आ जे गलत होई ओकरा के रउआ खा लेब’। इ बात सुन के बिलार कहलस - “अरे रे.... तू लोग इ कईसन बात कह देलऽ लोग। हिंसा जईसन पाप नईखे ऐह दुनिया में। दोसरा के मारे वाला खुद नरक में जाला। हम तोहन लोग के न्याय देवे में मदद जरूर करब, बाकि जे गलती प बा ओकरा के हम खा नईखी सकत, इ पाप हमरा से ना होई। हम एगो बात तू लोग के कान में कहल चाहतानी, तनिका हमरा भीरी त आवऽ।'

खरगोश अवरू चिड़िया खुश हो गईले कि, अब फैसला होके रही। इ सोच बिलार के बिलकुल भीरी गईले। फीर का रहे ........? बिलार भीरी आईल खरगोश के पंजा में अवरू मुंह में चिड़िया के दबोचलस। बिलार दुनों के काम तमाम क दिहलस। आपन दुशमन के बारे में जनला के बाद भी ओकरा प विश्वास क के खरगोश अवरू चिड़िया आपन जान गवां देलस।

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