सेठ जी के बईठक अवरू सेठ जी के ज्ञान

एगो गांव में एगो सेठ जी रहत रहले। सेठ जी पढ़ल-लिखल ना रहले। सेठ के तीन गो बेटा रहले, तीनों बेटा के सेठ कवनों नाम ना रखले रहन।

बड़का बेटा के बड़का कहस, मंझीला के मंझीला अवरू छोटका के छोटका कही के बोलावत रहले। सेठ आपन तीनों बेटा के कबो स्कूल ना भेजले। उनकर बेटा इ ना जानत रहलेसन कि स्कूल कवन चिड़िया के नाम ह। सेठ के अपना धन प बहुते घमंड रहे, उ हमेशा इ कहत रहले कि, भगवान के दिहल त सभ कुछ बाटे हमरा भीरी, हमार लईका पढ़-लिख के का करीहे'सन, पढ़-लिख के केहु के चाकरी त करे के नईखे!

सेठ के बड़का बेटा तनिका समझदार रहे, बाकी मंझीला अवरू छोटका के त बुद्धि से भेंटे ना भईल रहे। अतने ना उ दुनों एक नंबर के आलसी भी रहले'सन। सेठ जी एगो मुनीम भी रखले रहन। उ मुनीम सेठ के लेन-देन के हिसाब राखत रहले। एक दिन के बात ह मुनीम कहले - 'चाचाजी गुजर गईले'।

सेठ कहले - काहां से गुजरले ह? ऐने से त ना गईले ह, कवना राही से गुजरले ह?मुनीम आपन माथा पिटत कहले - अरे सेठ जी उ भगवान के घरे चल गईले। सेठ कहले - हो सकता कुछुओ बकाया होई, ना त चाचा जी आपन दुकान छोड़ के कतही जाले!

सेठ जी के बात सुन मुनीम चिढ़ गईले, कहले - 'अरे चाचा जी मर गईले। उनका घरे रोअल-धोअल मचल बा।' सेठ जी कहले - इ त बहुत बाउर हो गईल, चल कवनों बात ना उनका परिवार के कवनों चीज के परेशानी ना होई। मुनीम फिर आपन माथा पिटत कहले - चाचा जी के मेहरारू बाड़ी, छोटे-छोटे चार गो बेटा-बेटी बाड़े'सन, बूढ़ महतारी बाड़ी, बहुत लोग चाचा जी के ग्राहक भी रहन, ओह कुछ लोग के लेनदेन भी होई।

समूचा गांव चाचा जी के दुआरी प जामा भईल बा पुछार करे खाती। एहसे, चाचा जी के परिवार के मदद करे खाती, सेठ जी रउआ भी जाए के चाही। सेठ आपन माथा खझुलावत कहले - उ हमरो त चाचा रहन बाकी मुनीम तू इ निमन से जानत बाड़ कि, हम आपन बइठक छोड़ के कतही न जानी। सभ काम बइठ के ही निपटावेनी। आज तक हम केहु के मरला प भी नईखी गईल। हमरा का पता बा कि ''ओहिजा जा के का करे के होई?'' हमरा त कवनों जनावर के भी रोअल पसंद ना परे, त आदमी के रोआई कईसे सुनब। हमार छोटका बेटा के 10 हजार रूपिया दे द, उ दे आई। आखिर अपना बेटा के भी त समझदार बनावे के बा।

छोटका बेटा रूपिया लेके चल देलस। गाँव के कुछ लोग चाचा जी के पुछार क के आवत रहले, त आपसे में बतियावत रहले की चाचा जी के त शराब जान ले लिहलस, त केहु कहल कि निमन भईल चाचा जी मर गईले, ना त उनका जुआ के बाड़ा खराब आदत लाग गईल रहे। अब कम-से-कम अब उनुकर बाल-बच्चा चैन से त रही! चाचा जी के परिवार त रोज-रोज के चिक-चिक से त बाचल! सेठ के छोटका बेटा भी ई सभ बतियावल सुन लेलस। जब छोटका चाचा जी के घरे पहुंचल त रूपया देत कहलस - "चाचा जी के त शराब खा गईल, उनका जुआ के आदत पड़ गईल रहे। जवन भईल उ बढ़िया भईल, आप लोग के रोज-रोज के चिक-चिक से त मुक्ति मिलल! अब रउआ सभ आराम से त रह सकब!

छोटका के बात सुन चाची ज़ोर-ज़ोर से माथा पीट के रोवे लगली। कुछ लोग उठ के छोटका के मारे पिटे लगले। छोटका केहु तरे जान बचा के भागल। छोटका घरे आके सेठ जी के सभ बात बतवलस। छोटका के बात सुन के सेठ आपन मंझीला बेटा के बोलवले। मंझीला के बीस हजार रूपिया देके कहले, देख मंझीला 'छोटका जाके काम बिगाड़ देले बा, तू जो आ बिगड़ल बात के संभाल ले।'

मंझीला चाचा जी के घरे पहुंचल। अभी तक रोअल-धोअल चलते रहे। मंझीला त बिगड़ल बात ‘सम्हारे’ आईल रहे त भला चुप कईसे रहे। मंझीला कहलस- हमरा के सेठ जी भेजले बानी। चाची के बीस हजार रूपिया देत कहलस कि 'तनिका देर पहीले छोटका आइल रहे, अभी उ बहुते छोट बा कुछु गलती बोल के चल गईल ह। चिंता के कवनों बात नईखे, अब से केहू मरी त छोटका ना हम आइब।' ल, अब ना बनल - अवरू बन गईल।

एतना बात सुनते चाची चिल्ला-चिल्ला रोवे लगली। छोटका के मार पड़ल त भला मंझीला कईसे बाच के आइत, ओकरो के खाए भर लोग बान्हीए दिहले। अब त बात अवरू बिगड़ गईल, मुनीम बेचारु केहू तरे बात के सम्हरले। कुछ दिन बाद जब चाचा जी के क्रिया-काम होखे के रहे ओह दिन मुनीम सेठ जी के कहले कि, 'सेठ जी आज त कम-से-कम चल जाई। बाक़ी सेठ जी काहे के जाए-जास। उ आपन बड़का बेटा के बोलवले, आ तीस हजार रूपिया देत कहले, 'हमार बात कान खोल के सुन, छोटका अवरू मंझीला जाके काम त बिगाड़ आइल बाड़’सन, तू जाके कुछ अईसन कर कि बिगड़ल बात समहर जाय।'

बड़का दुनों से तनी चतुर चालाक रहे। उ तीस हजार रूपिया लेके गईल आ कुछ देर के बाद वापस आ गईल। बड़का सेठ जी के रूपिया देत कहलस कि 'आपके चाचा जी त बहुते परेशानी में रहन। उ आपन समुच जिनगी दुकान में ही बिता दिहले। दुकान ही उनकर सभ कुछ रहे, दुकान में ही सुतस आ दुकान में ही बइठस। जियत जिनगी कवनों सुख ना कईले। आज उनका क्रिया-काम में समूचा गांव जामा भईल बा। रंग-रंग के पकवान बनल बा। चाचा जी के जे करजा लेले बा आज उहो पाती प बईठ के खाना खात बाड़े। लोग अंगूरी चाट-चाट खात बाड़े, जईसे उ केहू के मरला प ना बालुक कवनों शादी-बियाह में खात होखस।

बड़का आगे कहलस कि दान में बरतन, खाटी-माची, से लेके अनाज के संगे-संगे ना जाने केतना तरह के चीज दान कईल जाता। राउर चाचाजी जवन कुछ कमइले रहन, उ सभ आज श्राद्ध के नाम प लुटावल जाता। अईसन लूट खाती एको रूपिया दिहल बेकार बाटे।

बड़का के बात सुन के सेठ मुनीम के मुंह ताके लगले। मुनीम कहले 'बड़का बेटा ठीक कईनी, जे रूपिया ना देनी। एह तरे लुटावे खाती रूपिया देला के कवन काम बा। मुनीम कहले, सेठी जी दुनियादारी के समझ बईठक में बईठ के ना होखे, बालुक समाज में उठला बईठला से होखेला। सेठ कुछ देर सोचला के बाद कहले मुनीम ठीक क़हत बाड़। चाचा जी के परिवार के मदद त हम करब बाक़ी दूसरा तरीका से। सेठ जी कहले आज से हम ए बईठक के छोड़त बानी। आज से हम लोग के बीच उठब-बईठब।

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