लक्ष्मी जी, विष्णु जी के पत्नी हई, त इनिकर पुजा गणेश जी के संगे काहें होखेला?

लक्ष्मी जी, विष्णु जी के पत्नी हई, त इनिकर पुजा गणेश जी के संगे काहें होखेला?

लक्ष्मी जी के संगे गणेश जी के पूजा काहें कईल जाला? हो सकता कि इ सवाल आप लोग के मन में भी आईल होई! लेकिन एकर कारण बहुत बरियार अवुरी गूढ़ बाटे।

सामाजिक रेवाज़ के मुताबीक लक्ष्मी जी के संगे विष्णु जी के पूजा होखे के चाहत रहे, लेकिन अयीसन कवन कारण बा कि भगवान विष्णु के बदला लक्ष्मी जी के संगे गणेश जी पुजाए लगाले?

लक्ष्मी जी के चंचला भी कहल जाला। कहल जाला कि, लक्ष्मी जी के अलावा अवुरी सभ देवी स्थिर होखेली, ओ लोग के कृपा जेकरा प होखेला उ स्थाई रहेला, बाकिर लक्ष्मी जी के संगे अयीसन नईखे, इनिकर कृपा स्थायी ना होखे, बदलत रहेली।

आखिरकार लक्ष्मी जी एतना चंचल काहे रहेली? उ एक जगह काहें ना ठहरस?
एकर जवाब त खुद लक्ष्मी जी अपना रूक्मिणी अवतार में देले बाड़ी।

उ कहले बाड़ी कि
"नाक्मर्मशीले पुरुषे वसामि, ननास्तिके सांकरिके कृतघ्ने।
न भिन्नवृत्ते न नृशंसवर्णें न चापि चौरे न गुरुष्वसूर्य॥"

एकर मतलब भईल कि - “आलस से भरल आदमी में, एहसान ना मानेवाला में, नास्तिक में, बिना सेवा भाव वाला में, चोर में अवुरी गुरु के शिकायत आ उनुका से ईष्या करे वाला आदमी में हम कबो निवास ना करेनी। “

इ सभ आदत जेकरा में ना रहेला ओकरा में ही लक्ष्मी निवास करेली। आम तौर प देखल जाय त लोग धन-दौलत पावे खातिर बहुत कोशिश करेले आ जब धन-दौलत हो जाला, त धीरे-धीरे कुछ लोग में ए प्रकार के अवगुण आ जाला।

तब अयीसन हालत में लक्ष्मी जी धीरे-धीरे उहाँ से खसके लागेली अवुरी एक दिन ओ आदमी के छोड़ दोसरा भीरी चल जाली। एही से लक्ष्मी जी के चंचला भी कहल जाला।

गणेश जी के सिद्धि देवेवाला देवता के रूप में मानल जाला। जीवन के हर वाधा के दूर क ओकरा के मंगलमय अवुरी शांतिपूर्वक जिए खातिर गणेश जी के पूजा बहुत जरूरी ह।

दिवाली प धन, समृद्धि अवुरी सौभाग्य खातिर लक्ष्मी जी के पुजा कईल जाला। आखिर लक्ष्मी जी ही त धन के देवी मानल जाला। लेकिन, एगो इहों बहुत बड़ सच्चाई बा कि बिना बुद्धि के धन कवना काम के रही!

जब बुद्धि ही ना रही त धन रहला से कवन फायदा होई? एह से धन-दौलत के संगे-संगे बुद्धि-ज्ञान होखल भी जरूरी बा। समाज अवुरी शास्त्र के मुताबीक गणेश जी बुद्धि के भंडार हवे, एहसे लक्ष्मी जी के संगे-संगे गणेश जी के भी पूजा करे के विधान बनावल गईल।

अयीसे त लक्ष्मी जी के संगे गणेश जी के पूजा के संबंध में कई तरह के कहानी बा, ओहि कूल्ही में से एगो कहानी में हे तरह क विवरण बाटे......
एक बेर बैकुण्ठ धाम में विष्णु जी अवुरी लक्ष्मी जी बातचीत करत रहले। लक्ष्मी जी एगी बातचीत में, आपन बड़ाई अपने करत-करत अपना के पूजनीय अवुरी श्रेष्ठ बतावे लगलि। उ कहली कि, उनुकर कृपा जेकरा प हो जाला ओकरा तीनों लोक के सभ सुख मिल जाला।

लक्ष्मी जी के मुंह अयीसन बात सुन अचरज भईल, सोचे लगले कि लक्ष्मी के भीतर अहंकार भर गईल बाटे। एह अहंकार के केहू तरे खत्म करे के परी।

इहे सोच विष्णु जी कहले कि "तू सर्वसम्पन्न होखला के बावजूद आज ले एगो महतारी के सुख ना पावे सकलु। तीनों लोक में इ सुख जवन नारी ना मिले, ओकरा खातिर समूचा सुख कवनों काम के नईखे।"

विष्णु जी के इ बात सुन के लक्ष्मी जी के बहुत दुखी हो गईली। उ तुरंत आपन प्रिय सखी, पार्वती के भीरी गईली आ आपन दुखड़ा सुनवली। पार्वती जी सभ बात के जानकारी लेला के बाद सवाल कईली - “बताव हम तहार मदद कईसे कर सकीले? हम तोहार दुख कईसे खतम क सकतानी?”

तब लक्ष्मी जी उपाय बतावत कहली कि, “सखी तोहरा दु गो बेटा बा। अगर तू आपन दुनो बेटा में से एगो कवनो एगो बेटा के हमरा के दे देबू त हमार दुख दूर हो जाई। एगो बेटा देला के बाद भी तहरा भीरी तहार एगो बेटा रह जाई, लेकिन हमरा ऊपर से बांझ होखे के दोष मेट जाई”।

इ सुन पार्वती जी कहली -“सही बात बा कि हमरा दु गो बेटा बाड़े। कार्तिकेय अवुरी गणेश। कार्तिकेय त छ्ह गो मुंह वाला हवे। उनुका त दिन भर खाए खातिर चाही। काहेंसे कि छह मुंह के क्षुधापूर्ति खातिर हमेसा कुछ ना कुछ खाये के परेला। छोटका बेटा गणेश हवे। उ बहुत नटखट हवे। उनुका प से नजर हटल ना कि, उ सभ कुछ नहस-तहस क के राख़ दिहे। एने तु ठहरलू चंचला, तु हमरा दुनों बेटा में से कवनों एगो बेटा के कईसे सम्हारे पईबु?”

पार्वती जी के बात सुन लक्ष्मी जी कहली - पार्वती हम तोहरा बेटा के अपना से भी अधिका प्रेम अवुरी दुलार के संगे राखब। चाहे कार्तिकेय होखस भा गणेश। हम दुनों जाना के बहुत निमन से राख़ सकीले। एहसे हे पार्वती तू आपन दुनों बेटा में से कवनों एगो बेटा के हमरा दत्तक पुत्र के रूप में दे द”।

लक्ष्मी जी के जवाब से संतुष्ट भईला के बाद पार्वती जी फैसला कईली कि उ आपन छोटका बेटा, गणेश जी के लक्ष्मी जी के दत्तक पुत्र के रूप में दे दिहे।

पार्वती जी के फैसला जनला के बाद लक्ष्मी जी उनुका से कहली कि - “आज से हम आपन सभ सिद्धि अवुरी सुख-सम्पत्ति गणेश के दे देतानी। समूचा लोक में जे केहु गणेश के पूजा ना करी त हम ओह आदमी से कोसों दूर रहब अवुरी जे गणेश के पुजा करी, ओकरा भीरी हम जादा समय तक रहब”।

लक्ष्मी जी कहली कि, अब से जब भी हमार पूजा कईल जाई संगे-संगे गणेश के पूजा कईल भी जरूर होई।

लक्ष्मी जी के मुंह से आपन बेटा के बारे में एह तरे के बात सुन के पार्वती जी बहुत खुश भईली अवुरी गणेश के उनुका हवाले क देली। एकरा बाद से जब भी लक्ष्मी जी के पूजा कईल जाला त संगे-संगे गणेश जी के पूजा भी जरूर कईल जाला। असहू, गणेश जी के त कवनो पुजा में पहिले पुजाए के वरदान मिलल ह।

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