दुनिया के सबसे बड़ झूठा जब अपना झूठ के चलते अझुरा गइल

दुनिया के सबसे बड़ झूठा जब अपना झूठ के चलते अझुरा गइल

मंगरु के बढ़-बढ़ के, हर बात के बढ़ा-चढ़ा के बोले के आदत रहे। उ अपना ए आदत से बहुत परेशान रहले। लेकिन, आदत रहे कि छूटते ना रहे।

चुकी, मंगरु अपना आदत से परेशान रहले, अवुरी जानत रहले कि उनुका से अयीसन गलती हो जाला, एहसे गजोधर के हरमेस अपना संगे राखत रहले। मंगरु, गजोधर से कह देले रहले कि, 'जब लागे कि हम ढेर (बड़ झूठ) बोल देले बानी, त कुर्ता खींच दिहे। हम बुझ जाईब अवुरी गलती के सुधार देब।'

एक दिन मंगरु अवुरी गजोधर बाज़ार में घुमत रहले कि उहें मंगरु के पुरान संघतिया, मुनेशर भेटा गईले।

मुनेशर: आव-आव ए मंगरु, बाड़ा दिन प भेटाईल बाड़े। काहां रहतारे मरदे, एकदम लउकते नईखीस!
मंगरु: का कहीं ए मुनेशर, हम त अरब में नु रहेनि।

मुनेशर: अच्छा, ए मरदे हमहू त ए घरी ओहिजे रहतानी, काहां रहेले?

अब मंगरु अरब त गईल ना रहले, लेकिन बोल देले रहले, एहसे कहले -
मंगरु: उहें जाहां 100गो रहिया मिलेले।

मंगरु के जवाब सुन गजोधर के कान खाड़ा हो गईल, काहें कि चौराहा-तिराहा त होखेला लेकिन सौराहा ना होखे, एहसे उ मंगरु के कुर्ता खींच देले। कुर्ता खिंचाते मंगरु बुझ गईले कि ढेर बोला गईल बा अवुरी तुरंत सुधार क के कहले -

मंगरु: अरे मरदे ढेर बोला गईल हा, 100गो ना, 90गो रहिया जाहां मिलेले उहें हम रहेनि।

इ सुनला के बाद गजोधर फेर कुर्ता खिंचले, अवुरी मंगरु फेर सुधार कईले।
मंगरु: हई चाम के जीभ अझुरा देतिया कहेवाला रही 80गो, त कहा गईल 90गो। जाहां 80गो रहिया मिलेले उहें हम रहेनि।

एकरा बादो गजोधर कुर्ता खिंचले, लेकिन अबकी बेर मंगरु के खीस बर गईल। खिसियाके गजोधर से मंगरु कहले -
मंगरु: सुन, अब कुर्ता खिंचत-खिंचत फ़ारिओ देबे नू, त 70 से नीचे ना जाईब!

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