गाँव | सपना - सच से अनजान

गाँव | सपना - सच से अनजान

ए भाई का हाल बाटे हो ? तेनी हेने आव तोहरा से कुछ पूछे के बाटे? एतने कान के चादर ले बात पहुँचल रहे की हम पीछे मुड़ गईनी, देखनी त पवनी की एगो बाबू कांख में करियका बेग लटकवले, हाथ में बड़का मोबाइल लेले, हमके इशारा करिके अपना ओरी बोलावत रहले।

गईनी हमहू तेनी अंग्रेजिये मिला के पूछनी, हाँ सर कहलजाव का सेवा करी हम राउर? देख हम पटना से आइल बानी अउरी हमरा गाँव के बारे में कुछ जाने के बाटे? मन में हमरा कगो सवाल एक संगे आइल, लेकिन हम ओमे से एके पहिले निकलनी, 'काहे खातिर सर?'

जवाब मिलल 'हम पीएचडी कर रहल बानी' "भूमंडलीकरण के युग में ग्रामीण जीवन" नाम के शीर्षक प ओही से हम चंपारण के ए गाँव में आईल बानी।

हमरा उनुकर बात पूरा समझ में आ गईल रहे तबहुओं दिमाग में कुछ सवाल रहे, लेकिन हम ओहके मनावत रहनी की अतने में उ टप से सवाल क देहलें की, तू इंहवे रहे'ल की शहर में? जी हम ए घरी त गंवहीं बानी लेकिन एगो जमाना रहे जब बाबूजी हमनी से ढेर पढ़ावे के फेरा में शहर ले गईल रहनी, तबो कह सकेनी की पूरा बचपन त हमनी के गाँव के छाव में बीतल रहे।

गर्मी के छुट्टी में कबो-कबो हमनी के शहर से गावँ आवत रहनी'सन, ना त छठ परब में गाँव जाए के कार्यक्रम त लगभग हर साल निश्चित रहे। हमनी के शहर का अईनी गाँव के सभ खेत बटाई पर चल गईल।

हई ना देखी, आपन परिचय त हम रउरा के देबे न कईनी, हमार नाम रमन हवे। कृषि विज्ञान से स्नातक कईला के बाद अब हमहूँ अपना गाँवें में रहिले, कीटनाशक बेचे वाला एगो दुकान चालवेनी संगे-संगे एगो निजी गन्ना कंपनी से जुडल बानी, ओहमे अपना क्षेत्र के गन्ना के सर्वेक्षण के जिम्मेवारी बाटे।

मन त हमार करत रहे की कुछु अउरी कही, तले शहरी बाबू बिचवे में टोक देहले 'रमन जी, हमरा गाँव से जुड़ल लगभग हरेक विषय पर तनी-तनी बतावल जाए।'

सर पहिले रउरा आपन नाम बताई? हमार नाम गोपाल हवे। जी ठीक बा अब हेने आयीं, कवन चीज के जल्दीबाजी बा, हम राउर सभ सवाल के जबाब दे देम, पाहिले तनिका ठंडा लेहल जाए, बाड़ा गर्मी बा, आयीं हेने घोटा में बइठल जाव।

हमनी के घोटा देने चलनी सन, अउरी हम आवाज मरनी, मंगरु हो, तनी दू गिलास चापाकल से ठंडा पानी लेआव अउरी भौजी के कह दिह की तनी चाह बनावे।

ओ बेरा पीएचडी से जुड़ल क गो सवाल हमरा भीतर जाग गईल रहे, एक-एक करत हम उगिले के कोशिश में करे लगनी।

'सर एक दिन में राउर पीएचडी ला जानकारी मिल जाई?', बहुते मासूम तरीका से हम ए सवाल के अपना मुह से निकलनी। तब गोपाल बाबू कहल शुरु कईले 'ना जी, एकदिन में का होई, लेकिन एकरा से हमनी के विवरण बनावे मे बड़ी मदद मिली, हम लक्ष्य रखले बानी कम से कम 10 गो जिला में जाके हालत के देखब, रउरा जिला में सबसे पहिले आईल बानी। चंपारण के नाम हम बहुत पहिले सुनले रहनी एहिसे पहिले हम चंपारण में अईनी।'

हमार अगिला सवाल रहे, 'अच्छा सर पीएचडी केतना साल के होला?' एकरा संगे हम फेनु एगो सवाल दाग देहनी। 'साढ़े तीन साल के अईसे हवे, लेकिन पूरा करे में जादा वक़्त लाग सकता।'

पानी आ गईल, 'पानी लेहल जाए सर', हम गिलासवा उठा के उहाँ के ओरी बढ़ा देहनी।

मंगरु जा के देख तनी चाय के हालत, ले आव।

एहीघरी, अचानक, गोपालजी पूछ बैठनी 'ई आधुनिकरण के जुग में गाँव में सबसे बड़का बदलाव का आईल?'

'सपना, सर सपना, हकीकत से अनजान सपना, आजकल के गाँव अब गाँव नईखे रह गईल, गाँव के नाम पर अब सिर्फ बुढ़ लोग रहतारे, गाँव के मतलब बदल गईल बा, छोट लईका पढ़े खातिर शहर पकड़ लेहलक अउरी नौजवान कमाए खातिर, जेकर इहवां खेत बारी बाटे उहो एकरा के हुंड़ी-बाटाई देके शहर पकड़ लेहलक। गाँव बा लेकिन ओकर आत्मा मर गइल बा, शहर के नकल के चलते गाँव मरल जाता, केहु पुछनिहार नइखे। लोग के सोच अजीब हो गईल बा, लोग के बुझाता की शहर माने तरक्की अवुरी प्रगति, गाँव माने गँवार। पिछला कुछ साल से सर मान के चली की शहर गाँव के अतिक्रमण (नाजायज कब्जा) क लेले बा।'

'ना अब गाँव में कही पनघट बा, नाही पायल के रूनुझुन सुनाई देता, अब गाँव के लोग नदी, पोखर में नहाईल तक नईखन चाहत। केहु बता देले बा की नदी में प्रदुषण के भरमार बा। पहिले गाँव के मुकदमा पंचईति (पंचायत) में सझुरा जात रहे, लेकिन अब कोर्ट जाए के परता, पहिले अपना बाप-माई के सेवा करे वाला लईका के चर्चा होखत रहे, अब चर्चा ओ लईका के होखेला जवन अपना बाबू-माई के घर से निकाल देवेला।'

गोपालजी चुपचाप टकटकी लगा के हमार बात सुनत रहनी, अतने में मंगरु आईल अवुरी कहलस, 'भइया चाह लेहल जाए।' हमनी के दुनू आदमी चाह के गिलास हाथ में उठवनी'सन, चाय के पहिलका चुस्की लियाईल रहे की गोपाल जी पूछ बइठले 'आछे हमके तनी इ समझाई की लोग शहर के ओरी एतना खिंचात काहे बा?' उनकर इ सवाल हमरा बहुत ठीक लागल।

'सर, दुनिया में हर जगह एके रीत बा, उहा के हरेक आदमी चाहेला की हमार आवे वाला पीढ़ी, हमरा से बेहतर बने, एही के तर्ज प इंहवो प्रयास होखता, जे जतने में बा ओतने में कोशिश करता, सभ केहु अपना आवे वाला पीढ़ी के निमन जीवन दिहल चाहता। शहर में मिले वाला शिक्षा गाँव से शहर के ओरी भागे के एगो प्रमुख कारन बा, गाँव के सरकारी स्कूल अब पाहिले जइसन नईखे, स्कूल के मकान त एकदम नाया हो गईल बा लेकिन शिक्षा के हालत खराब बा, गरीब के लइका अब उहाँ खाली खिचड़ी खाए जाले, शिक्षा के नाम पर कुछुओ नइखे भेटात, एहीसे जे तनी समझदार बा, उ कोशिस करता की हमार लइका तनी शहर में पढ़ित। एगो अंखिया में सपना बा की हमरो लइकवा तनी हमार नाम रोशन करीत, कुछ निमन करीत। एही खातिर लोग गाँव के 2 रुपया किलो के तरकारी छोड़, शहर के 10 रुपया किलो के तरकारी खाए पर मजबूर बाड़े।'

'एहमे सबसे ढ़ेर दोष राज्य सरकार अउरी केंद्र सरकार के बा, सर हम त इहे मानिले, काहेकी आजादी के बाद से जतना ध्यान शहर के विकास प दियाईल, ओकर 50% ध्यान जदी गाँव के बचावे पर देहल रहित, त आज अयीसन हालत ना होइत। का गाँव में बढ़िया स्कूल नइखे खुल सकत? का गाँव में निमन इलाज के बेवस्था नइखे हो सकत? हो सकता सर, लेकिन केहु आज तक ईमानदारी से कोशिशे ना कइस। सच कही त अब त लोग के खेती में मने नइखे लागत, गाँव में पाहिले जतना कुटीर उधोग रहे सब बंद हो गईल।'

गोपाल जी फिर एगो सवाल दाग देले – 'आछे त रमन जी एगो बात बताई, सरकार जवन एतना योजना चलावतिया, गरीब लोग खातिर, ओहसे ए लोग के जीवन प कवनो असर भईल बा का?'

'देखीं सर, आदमी के हालत तबहिए सुधरेला जब ओकरा ज्ञान होखेला की हम का करत बानी अवुरी हमरा का करे के चाही।'

हमनी के दुनू आदमी के गिलास में से चाह खत्म हो गईल रहे लेकिन बात अभिनो बहुते रहे, गोपाल बाबू के मन में बहुत बिंदु प दुविधा रहे। अचानक से गोपाल बाबू पूछ बईठनी, 'रमन जी एगो बात बताई, रउरा हिसाब से आजादी के बाद से गाँव के जीवन स्तर, रहन सहन में का का बदलाव आइल बा?'

इ एगो अइसन सवाल रहे जेकर उत्तर केहु बहुत आसानी से नइखे दे सकत, फिरू हम मन के समेट के कहल शुरू कईनी, 'गोपाल सर, हमरा त लागेला की हरेक गाँव हमनी से कुछ सवाल पुछेला, जईसे ओकर कवन गलती बा जेकरा चलते लोग ओकरा से ठुकरावत जाता, जे केहु तनी बड़का बनल गाँव से शहर के ओरी बढ़ल, उ काहें शहर के होके रह गईल? काहें अपना गाँव के, अपना समाज के, अपना लोग बाग के भुला गईल? गाँव त हरदम बाटे जोहत (रह देखल) रह गईल की, केहु अपना धरती प आईत, तनी हमरा के संवारित, सम्हारित, कुछ आगे बढाईत, खाली अपने आगे बढ़ल कवनो बढ़ल न होखेला, बढे के मतलब होखेला की अपना संगे-संगे दोसरो के आगे ले के चलाल जाव। गोपाल सर बदलाव के बयार अइसन चलल की बहुत कुछ बदल गईल, ना अब उ सभ्यता लउकता, ना उ संस्कृति, सब कुछ धीरे धीरे खत्म होखत जाता। अब त जुग ई आ गईल बा की लोग गाँव के नाम पर लजात अउरी शर्मात बाड़े, सकुचात बाड़े। एतनो कहे में की हम हे जगहिया के हई, हमार हई गाँव हवे। हमरा कुछु बदलाव महसूस न होखेला उहे पुरनकी मानसिकता, जातिवाद में जकड़ल समाज, समझदारी से ज्यादा स्वार्थ के महत्व। सपना अइसन लोग देख रहल बा जेकर नाव जमीन पर कहीं हईले नइखे. आज के नौजवान के खेती करे में लाज लागता, गाँव में मजदूरी भा रोजगार नइखे हो सकत, लेकिन उहे काम शहर में आसानी से होखता।'

अभी हम अतने कहले रही कि सुरेश काका अवाज देहले, रमन, जी काका, का हो पंचाईती में नइखे चले के का, ना ना चलेम नु रउरा आगे बढ़ी हम पीछे से आवतानी, ठीक बा। काका इहे क़हत आगे बढ़ गईनी।

फिर हम गोपाल बाबू से पूछनी की आजे निकल जाएके बा की, रहे के बा? ना, आज रात रुकम। तब त ठीक बा, फेरु बात होई, अभी खातिर हम माफ़ी चाहब काहेकी हमरा एगो पंचाईती में जाए के बा। ठीक बा कवनो दिक्कत नइखे, गोपाल बाबू सहमती में आपन मुड़ी हिलवले।

गोपाल बाबू कहले की, ठीक बा, त हम चलतानी। जी आवल जाई दुबारा, जी हम प्रयास करेम। हमहूँ उठनी, मन में हमरो बहुते सवाल जाग गईल रहे, मनवा में हम सोचत रहनी की इ कइसन अनजान सपना बा की लोग कमाए खातिर गाँव छोड़के, दूर शहर में जाला लेकिन हरेक केहु के जीवन में एगो अयीसन समय आवेला जब उ फेर शहर से गाँव के ओर लवटेला। इंसान से इ सपना जे ना करावे ... ।


रचनाकर के परिचय
जलज कुमार अनुपम
पिता: पं शर्मा नन्द मिश्र
माता: स्वर्गीय गायत्री मिश्र
आवास : बेतिया, पश्चिमी चंपारण बिहार - 845438,भारत
संपर्क सूत्र : +91-9971072032
शिक्षा : बी .टेक (इलेक्ट्रॉनिक्स), MUACEE (ऑस्ट्रेलिया)
पेशा : प्रबंधक (टेक्नीकल), राइज एलेवेटर्स, नई दिल्ली, भारत
पुरस्कार : चन्द्रेशेखर आज़ाद पुरस्कार - 2015 (समाजिक कार्य हेतु)
प्रकाशित रचना : बाल कथा (2009) अवुरी कविता संग्रह
अप्रकाशित रचना : आकांक्षा (उपन्यास ), बोल मेरे मन (कविता संग्रह), शादी भारत में (व्यंग)

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