नीतीश कुमार के विकासवाद के पंचनामा!

नीतीश कुमार विरोधी दल के तमाम दावा के खारिज करत विकास के बड़े-बड़े आंकड़ा गिनवावत रहतारे। सवाल बा कि झूठ के बोलता? जदी केहु झूठ नईखे बोलत, त केकरा दावा में सच्चाई के पूट कम बा?

नीतीश कुमार विरोधी दल के तमाम दावा के खारिज करत विकास के बड़े-बड़े आंकड़ा गिनवावत रहतारे। सवाल बा कि झूठ के बोलता? जदी केहु झूठ नईखे बोलत, त केकरा दावा में सच्चाई के पूट कम बा?

बिहार विधानसभा चुनाव के देश के चुनाव कहल जाता, कहल जाता कि इ चुनाव देश के राजनीति के भविष्य तय करी, कहल जाता कि ए चुनाव के नतीजा से साफ हो जाई कि नरेंद्र मोदी अवुरी नीतीश कुमार में से असली विकासपुरुष के ह!

ए सभके बीच दु गो मुद्दा के चर्चा ए चुनाव में बहुत होखता। पहिला बा कि मतदाता 'विकास' के वोट दीहे कि 'जाति' के? वर्तमान सरकार के उखाड़ फेंके के दम भरेवाली भाजपा के दावा बा कि बिहार में पछिला 60 साल में कुछ नईखे भईल। पार्टी, नीतीश कुमार के ओ शासन तक के खारिज करतिया, जवना में उ खुद आठ साल तक सझिया रहल बिया।

ओने नीतीश कुमार अपना विरोधी लोग के तमाम आरोप के खारिज करत, बड़े-बड़े आंकड़ा गिनवावत रहतारे। सवाल बा की झूठ के बोलता? जदी केहु झूठ नईखे बोलत त केकरा दावा में सच्चाई के पूट कम बा?

ए सवाल के जवाब जाने खातिर हमनी के नीतीश कुमार के कार्यकाल के आंकड़ा के तुलना बाकी राज्य के आंकड़ा संगे करे के परी। समझे के पड़ी कि अलग-अलग पैमाना प नीतीश कुमार के शासन में बिहार संगे का भईल?

प्रति व्यक्ति आय
आज़ादी के समय से लेके आज तक बिहार के गिनती गरीब अवुरी पिछड़ा राज्य में होखेला। केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ा के मुताबिक नीतीश कुमार जब 2005 में गद्दी सम्हरले त बिहार के प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय औसत के मात्र 29.2% रहे। शायद भारत में राज्य में सबसे कम।

एकरा के आसानी से ए प्रकार से समझल जा सकता – जब भारत के हरेक आदमी के औसत आय 1,000 रुपया रहे त बिहार के नागरिक मात्र 292 रुपया के कमाई करत रहन।' हालांकि नीतीश कुमार के शासन में राज्य के प्रति व्यक्ति आय बहुत बेहतर त ना भईल, लेकिन साल 2013-2014 में बिहार के प्रति व्यक्ति आय, राष्ट्रीय औसत के 38.9% तक पहुँच गईल।

सकल घरेलु उत्पाद
नीतीश कुमार हमेशा दावा करत आईल बाड़े कि उनुका नेतृत्व में बिहार के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) के विकास के दर देश में सबसे जादा रहल बा। नीतीश के आलोचक ए विषय प कहेले कि 'चुकी बिहार के जीडीपी के आधार बहुत छोट बा एहसे विकास के दर जादा रहला से कवनो खास फर्क ना परे।'

एहसे निमन होई विकास दर के अझुरहट के छोड़, भारत के जीडीपी में बिहार के हिस्सा प नज़र डालल जाए। समझल जाए कि नीतीश के शासन में देश के जीडीपी में बिहार के हिस्सा बढ़ल, की घट गईल?

केंद्रीय सांख्यिकी विभाग के आंकड़ा के मुताबिक जब 2005 में नीतीश सत्ता में अईले त जीडीपी के आकार के हिसाब से बिहार देश में 15वां स्थान प रहे। तब 82,490 करोड़ रुपया के कुल जीडीपी संगे भारत के कुल जीडीपी में बिहार के हिस्सा मात्र 2.5 प्रतिशत रहे।

नीतीश के दस साल के शासन में बिहार के जीडीपी के आकार बढ़ के 402,283 (2014-15) करोड़ रुपया हो गईल। ए आंकड़ा के मुताबिक भारत के जीडीपी में बिहार के हिस्सा 2005-06 के 2.5 प्रतिशत से बढ़के, 2013-14 में 3.1 प्रतिशत से अधिका हो गईल। एहबीच जीडीपी में आकार के हिसाब से देश में बिहार 15वां स्थान से ऊपर उठत 12वां स्थान तक पहुँच गईल। नीतीश के पूरा शासन में बिहार के डीजीपी औसत 13.2 प्रतिशत के विकास दर से आगे बढ़ल।

खेतीबाड़ी
बिना कवनो विवाद के सच्चाई बा कि बिहार में जरूरत भर औद्योगिक विकास ना होखे से राज्य के जनता अपना रोजी-रोटी खातिर खेतीबाड़ी के आसरा प बिया। ए मामला में नीतीश कुमार दस साल के शासन में का भईल?

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ा के मुताबिक नीतीश के 10 साल के शासन में बिहार के कृषि विकास दर, राष्ट्रीय औसत के पीछा छोड़त, देश में दूसरा स्थान प पहुँच गईल। ए 10 साल में जहां भारत के औसत विकास दर 3.79 प्रतिशत रहे, उहें नीतीश के बिहार 5.58 प्रतिशत के दर से विकास कईलस। पहिला स्थान प 5.65 प्रतिशत के संगे राजस्थान बा।

गरीबी
गरीबी दूर करे के मामला में नीतीश कुमार के कामकाज बहुत निमन रहल बा। योजना आयोग के आंकड़ा के मुताबिक 2005-06 में बिहार के 54.4 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे रहे, जवन कि 2013-14 में मात्र 33.74 रह गईल। हालांकि ए मामला में ओड़ीशा के नवीन पटनायक से नीतीश पिछड़ गईले, लेकिन तबहूँ इ काम उनुकर सराहे जोग बा।

सरकारी खर्च
नीतीश के शासन काल में बिहार के कुल बजट के सबसे जादा हिस्सा विकास के काम प खर्च भईल जबकि सामाज कल्याण दूसरा स्थान प बाटे। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ा के मुताबिक बिहार अपना बरोबरी के बाकी राज्य के तुलना में अपना बजट के सबसे जादा, 20.9 हिस्सा विकास प खर्च कईलस, जबकि 13.7 प्रतिशत हिस्सा समाज कल्याण प खर्चा भईल। ए दौरान बिहार के 'पूंजी खर्च' 5.6 प्रतिशत रहे। ए मामला में बिहार के रेकॉर्ड राष्ट्रीय औसत तक के मात दे देले बा।

ए सभके बावजूद बहुत कुछ अयीसन बा जाहाँ कुछ नईखे भईल। सरकार अपना पूरा तामझाम के बावजूद राज्य में सरकारी क्षेत्र के बहरी रोजगार पैदा करे में नाकाम रहल। विकास के कामकाज में बजट के जादा आवंटन के चलते समाज कल्याण के काम जईसे स्वास्थ्य अवुरी शिक्षा प असर परल।

जवना हालत में बिहार, नीतीश के मिलल रहे ओकरा के देखत उनुकर शासन विकास के मुद्दा प शानदार बा, लेकिन एकर चुनाव प कतना असर परी, कि ना परी, ए बारे में कुछूओ कहला के कवनो मतलब नईखे। असहूँ बिहार के चुनाव विकास के पैमाना प ना, जाति, धर्म, पईसा, गाय, गोबर अवुरी गायत्री के बल प जीतल जाला!

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