'कमंडल बनाम मण्डल' के राजनीति

पछिला एक साल के राजनीतिक घटनाक्रम त कम बतावता कि आज के राजनीति फेर ओ दौर में पहुँच गईल बिया जहां से धर्म अवुरी जाति आधारित राजनीति के शुरुआत भईल रहे।

पछिला एक साल के राजनीतिक घटनाक्रम त कम बतावता कि आज के राजनीति फेर ओ दौर में पहुँच गईल बिया जहां से धर्म अवुरी जाति आधारित राजनीति के शुरुआत भईल रहे।

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी के मिलल अपार सफलता देश के राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय के महत्व पहिले के मुक़ाबला बहुत कम क देलस!

पछिला एक साल के राजनीतिक घटनाक्रम त कम से कम इहे बतावता। आज के राजनीति फेर ओ दौर में पहुँच गईल बिया जहां से धर्म अवुरी जाति आधारित राजनीति के शुरुआत भईल रहे।

वीपी सिंह सरकार जब मण्डल कमिशन के सिफ़ारिश लागू करत रहे त ओकरा जवाब में लालकृष्ण आडवाणी के अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी कमंडल के राजनीति शुरू कईले रहे। तब 'मण्डल बनाम कमंडल' के राजनीति रहे आज 'कमंडल बनाम मण्डल' के राजनीति देखाई देता।

अभी तक क्षेत्रीय दल के एकाधिकार मानल जाए वाला दलित वोटबैंक अचानक देश के प्रमुख राजनीति दल के चहेता बन गईल। आज सभ दल ए वर्ग के वोटबैंक प कब्जा करे के पुरजोर कोशिश करता। हालांकि ए मामला में क्षेत्रीय दल अभियो ए प्रमुख दल से आगे बाड़े।

राजनीति के ए रूप के पहिला साफ झलक पछिला साल बिहार चुनाव से पहिले उत्तर प्रदेश के दादरी में भईल एगो घटना के समय मिलल। जहां भाजपा के कुछ नेता ए मौका के हिन्दुत्व से जोड़े के कोशिश कईले उहें कांग्रेस ए मामला में चुप रहत एकरा के असहनशीलता के विषय से जोड़लस।

कांग्रेस के पुरनकी राजनीति के मुताबिक इ मामला अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ल रहे, लेकिन नयकी राजनीति में इ 'असहनशीलता' के मुद्दा रहे। जहां उ एकरा के बढ़त धार्मिक उन्माद से जोड़त, कामयाबी से देश में बढ़त असहनशीलता के उदाहरण के रूप में पेश कईलस।

लेकिन, ध्यान रखलस कि मामला अल्पसंख्यक समुदाय के मत बने पावे। एकरा खाती उ कलबर्गी समेत कुछ अवुरी घटना के ए घटना से जोड़लस अवुरी एकरा के एगो विचारधारा विशेष के खिलाफ बना देलस।

अल्पसंख्यक शब्द के राजनीति से बहरी जाए के दूसरा बड़ उदाहरण दिल्ली से सटल फ़रीदाबाद में एगो दलित परिवार के कुछ सदस्य के कथित तौर प जरला/जरावला के घटना में देखाई देलस।

दादरी के घटना प चुप्पी साधेवाला राहुल गांधी ए मौका प केंद्र सरकार, राज्य सरकार अवुरी भारतीय जनता पार्टी प जमके बरसले।

तीसरा उदाहरण अभी भी जारी बा। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला के मौत के मामला में राहुल गांधी सांकेतिक भूख हड़ताल कईले। ए तीनों घटना में कांग्रेस के आवाज़ के अनजाने में, चाहे जानबूझ के भाजपा के सहयोगी दल तक समर्थन कईले।

राजद, जदयू, सपा, बसपा समेत बहुत दल के राजनीति त पहिलही से पिछड़ा अवुरी दलित प टिकल बिया, एहसे जब कांग्रेस एकरा में कूदल त भाजपा में खलबली मचल तय रहे।

लेकिन, भाजपा के सोझा सबसे बड़ मुश्किल ओकरा विचारधारा के चलते पैदा होता। अल्पसंख्यक त कबहूँ एकर मतदाता नईखन रहल, लेकिन ओकर कट्टर समर्थक वर्ग में दलित के मुक़ाबले स्वर्ण के संख्या जादा बा। ए स्थिति में पार्टी जदी कतहू से दलित-पिछड़ा के ओर झुकत देखाई दिही त ओ लोग के नाराज़ हो जाए के खतरा बा।

बिहार चुनाव में एकर नतीजा साफ देखाई देलस। विरोधी दल आरक्षण के मुद्दा उठवले, त मोदी अवुरी समुच भाजपा बचाव में उतरल। मोदी इहाँ तक कह देले कि उ आरक्षण के कायम राखे खाती जान दे दीहे। लेकिन, मोदी के इ बयान भाजपा के मतदाता के निराश कईलस अवुरी उहाँ-उहाँ पार्टी के हार कबूल करे के परल, जहां उ पछिला 25 साल में ना हारल रहे।

एही सभके देखत अब भाजपा के कोशिश बा कि उहो अल्पसंख्यक विरोध के छोड़त, फिलहाल कांग्रेस के नाया-नाया पैदा भईल दलित प्रेम से मुक़ाबला करे। एकर कोशिश तक देखाई देता, लेकिन ए कोशिश में सबसे बड़ परेशानी बा कि – कहीं उ दलित विरोधी मत बन जाए!

एह सभके बीच बहस के केंद्र अल्पसंख्यक प्रेम भा विरोध नईखे रह गईल, अब केंद्र में बाड़े दलित अवुरी दलित प्रेम। अब कोशिश बा कि एक दल दूसरा दल के दलित विरोधी साबित क देवे। कोशिश बा कि दोसरा दल के मुक़ाबले अपना के दलित के जादा हित साबित क देवे।

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