राहुल कांग्रेस बनाम इंदिरा कांग्रेस

राहुल गांधी ठीक ओही राह प चलतारे, जवना प इंदिरा चलल रहली, अब बस इंतज़ार बा ओ चमत्कारी क्षमता के, जवन कि इंदिरा में रहे

राहुल गांधी ठीक ओही राह प चलतारे, जवना प इंदिरा चलल रहली, अब बस इंतज़ार बा ओ चमत्कारी क्षमता के, जवन कि इंदिरा में रहे

आज़ादी के लड़ाई से निकलल कांग्रेस पार्टी आज अपना सबसे बाउर दौर में बिया। देश के सत्ता के शिखर प करीब 6 दशक तक विराजमान रहेवाली पार्टी के हाथ एक-एक क के हरेक राज्य के सत्ता निकलल जाता, अयीसना में कांग्रेस पार्टी के तलाश एगो आयीसन चमत्कारी नेता के बा, जवन एक झटका में एकरा के फेर से मुख्यधारा में लेया देवे।

पार्टी के नईया के खेवईया नईखे, नेता नईखे, लगातार चुनावी हार के बाद संसद समेत देश में सिर्फ कुछ जगह प सत्ता के कमान बाटे। कांग्रेस के आज के हालत देख के लागता की एकरा रात के भोर होखबे ना करी।

लेकिन कहल जाला कि राजनीति में कुछूओ हमेशा खाती ना होखेला, शायद एकरे चलते पछिला कुछ महिना में कांग्रेस पार्टी में तनिका आस बढ़ल बा लेकिन ए आस के बढ़े के पीछे राहुल-सोनिया से जादे पार्टी के ओ रणनीति के हाथ बा, जवन कि ए देश के अभी तक के सबसे जादे शक्तिशाली नेता देलस।

देश के आज़ादी के बाद से आज तक में इंदिरा गांधी के क्षमता के मुक़ाबला करे के हिम्मत केहु में नईखे भईल। हालांकि, इनिकों संगे आपातकाल निहन एगो अंधकार युग जुडल बा, तबहूँ इनिका के सबसे शक्तिशाली अवुरी चमत्कारी नेता मानल जाला। इहे इंदिरा आज अपना मौत के करीब 31 साल बाद कांग्रेस पार्टी के तारणहार बनल बाड़ी।

राजनीति के जानकार बहुत पहिले से कहत रहले कि, जदी कांग्रेस के आपन अस्तित्व बचावे के होखे त इंदिरा गांधी से सीखे के चाही। सिर्फ इंदिरा गांधी के तौर-तरीका, गुण अवुरी नेतृत्व के स्टाइल पार्टी के मझधार से निकाल सकेला अवुरी आवे वाला समय में जवन चुनौती मिली ओकरा से लड़े के शक्ति दे सकेला।

इंदिरा गांधी के हत्या के बाद, सहानुभूति के लहर में कांग्रेस पार्टी तीन-चौथाई बहुमत पवले रहे, लेकिन ओकरा बाद से आजतक, कबहू साधारण बहुमत तक ना जुटावे सकल। एने, कांग्रेस लगातार नीचे जात रहे त ओने अपना हाथ में 'कमंडल' लेले भाजपा अवुरी मंडल के माला फेरत जनता परिवार बहुत तेज़ी से सत्ता के नजदीक पहुंचत रहे।

राजीव गांधी के हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव के अगुवाई में अल्पमत के सरकार चलत, देश के आर्थिक हालत में सुधार भईल, जबकि भाजपा के एगो साधारण पार्टी से एनडीए के रूप धरत सत्ता तक पहुँच गईल।

लाचारी के हालत में कांग्रेस के नेता पार्टी के कमान सोनिया गांधी के सौंप देले। शुरुआत नीमन भईल, अटल बिहारी नीहन लोकप्रिय नेता के रहते भाजपा फेर एक बेर सरकार से दूर हो गईल अवुरी तब यूपीए के उदय भईल, कांग्रेस गठजोड़ के संगे सत्ता में लवट के आईल।

हालांकि, 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपना आंकड़ा में सुधार जरूर कईलस, लेकिन लगातार भ्रष्टाचार के आरोप में घेराईल पार्टी खातिर इ बढ़त एगो अयीसन दीया नीहन रहे, जवन बुताए से पहिले भभकत रहे। लगातार 10 साल तक केंद्र में सरकार चलावे वाली पार्टी के हालत अयीसन हो गईल कि उ लोकसभा में अपना खाती विपक्ष के नेता के पद तक ना जुटावे पवलस।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर, मृदुला मुखर्जी कुछ समय पहिले कहले रहली कि – ''इंदिरा गांधी एगो मजबूत, कठोर फैसला लेवेवाली, जिद्दी नेता रहली।''

मृदुला कहले रहली कि – ''नेतृत्व के मतलबे होखेला कि आप खतरा उठावे खातिर तैयार रहीं। जब तक आप पूरा मन से, एक खुल्लम-खुल्ला काम ना करब, तब तक आप चुनाव का कुछूओ नईखी जीत सकत। आज के कांग्रेस पार्टी के एकरे जरूरत बाटे।''

उ कहली कि, राजनीतिक दल के मुखिया रोज-रोज एके काम करे खातिर ना होखेला। राजनीतिक दल के मुखिया के काम चमत्कारी अवुरी इशारा से होखे के चाही।

मृदुला कहली – ''आप में कठोर फैसला लेवे के क्षमता अवुरी विचार होखे के चाही। इंदिरा गांधी राख़ से उठल रहली, एकरा खातिर उ जनता के मुद्दा उठवले रली।''

मृदुला के बात आज एहसे याद आवता काहें कि, कांग्रेस एक बेर फेर से ऊपर-झापर के राजनीति छोड़, जनता से जुडल मुद्दा के उठावे के कोशिश करत देखाई देतीया। ठीक ओसही, जईसे बिजली-पानी के मुद्दा के बल प दिल्ली में अजूओ अरविंद केजरीवाल अवुरी आम आदमी पार्टी के राजनीति कांग्रेस अवुरी भाजपा प भारी परतिया।

मृदुला एकरा के अवुरी सफाई से बतावत कहले रहली कि – ''1977 के लोकसभा चुनाव में बरियार हार के बाद इंदिरा के दूसरका पारी के शुरुआत बिहार में पटना ज़िला के बेल्छी से भईल। तब बेल्छी में एगो नरसंहार भईल रहे, जवना में कुछ दलित के हत्या भईल रहे।''

इंदिरा गांधी के बारे में कहल जाला कि आपातकाल के बाद कांग्रेस के राजनीति में इंदिरा एगो प्रयोग के तौर प वाम दल के नीति के शामिल क लेले रहली। आपातकाल के बाद इंदिरा 'तानाशाह इंदिरा' ना रहली, उ अपना के बदल लेले रहली।

लाल बहादुर शास्त्री के मौत के बाद 1966 में 48 साल के उमर में प्रधानमंत्री बनेवाली इंदिरा गांधी के सोझा तमाम प्रकार के चुनौती रहे। चुनौती सरकार के भीतरी अवुरी बहरी, दुनो ओर से रहे।

इंदिरा गांधी के हिम्मत अवुरी फैसला लेवे के क्षमता के नतीजा में सरदार पटेल के तय कईल 'प्रिवी पर्स' (तत्कालीन राजा लोग के हर महिना दियाएवाला रकम) खतम भईल, बैंक के राष्ट्रीयकरण भईल अवुरी 1971 के लड़ाई में पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश के जन्म भईल। बांग्लादेश के जन्म के बाद इंदिरा के लोकप्रियता आसमान छुवे लागल। अयीसन स्थिति बनल कि अटल बिहारी वाजपेयी तक उनुका के दुर्गा करार दे देले।

लेकिन, ए सभके बावजूद कोर्ट के एगो फैसला के खिलाफ 1975 में आपातकाल लगावे के उनुकर फैसला अजूओ आज़ाद भारत के इतिहास के काला अध्याय मानल जाला।

बांग्लादेश के आज़ादी से शिखर प पहुंचल इंदिरा के लोकप्रियता आपातकाल में पाताल में समा गईल। एकरा बाद जब चुनाव भईल त हालत अयीसन भईल कि खुद इंदिरा तक आपन चुनाव हार गईली। लेकिन हिम्मत के इंदिरा हार मनली, उ अपना राजनीति अवुरी कांग्रेस के फेर से जिंदा कईली। एकरा खाती उ कांग्रेस संगठन में एगो बड़ बदलाव करत अगड़ा-पिछड़ा-मुसलमान के एगो मजबूत तालमेल बनवली। समाज के हरेक वर्ग के उचित प्रतिनिधित्व दे एगो अयीसन लहर पैदा कईली कि जनता पार्टी सरकार के गिरला के बाद इंदिरा के जोरदार वापसी भईल।

आज के कांग्रेस के देखल जाए हालत लगभग आपातकाल के बाद वाली स्थिति नीहन बा। हाँ तब जनता पार्टी आज के भारतीय जनता पार्टी नीहन मजबूत ना रहे, ना तब नरेंद्र मोदी नीहन नेता रहले। लेकिन ए सभके बावजूद जदी आज के कांग्रेस नेतृत्व अपना के जनता से जोड़ता, जनता के बीच जाता, सामाजिक समीकरण के समझे के कोशिश करता, त आस देखाई देला प केहु के अचरज ना होखे के चाही।

जईसे इंदिरा अपना हार के बाद जनता से जुड़ाव बढ़ा देले रहली ओसही लोकसभा चुनाव के बाद अचानक राहुल गांधी बिना कवनो लव-लश्कर के चिंता कईले, गाँव-गाँव, शहर-शहर जाए शुरू कईले। एकरे नतीजा रहे कि लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बावजूद केंद्र के नरेंद्र मोदी सरकार दबाव में आ गईल अवुरी गाँव-गरीब के चिंता करे प मजबूर हो गईल।

जईसे इंदिरा गांधी कबहू हिम्मत ना छोडले रहली, कबहू हार ना मनले रहली, उ जिद्द के संगे अपना लक्ष्य के ओर बढ़त रहली अवुरी इहे बात आज के कांग्रेस नेतृत्व खातिर सिखल जरूरी बा।

शायद ए बात के कांग्रेस पार्टी तक समझ लेले बिया, पार्टी एक बेर फेर से ओ सभ मुद्दा प ज़ोर देतीया, जवना प सरकार समर्थक तक सरकार के बचाव कईल छोड़ देतारे।

हालांकि एकर नतीजा का होई इ त नईखे मालूम, लेकिन एतना तय बा कि जदी राहुल गांधी अपना मंशा में कामयाब भईले त सोनिया के कांग्रेस अवुरी राहुल के कांग्रेस में जमीन आसमान के फर्क होई।

राहुल के नजदीक से जानेवाला लोग कांग्रेस में जवना बदलाव के उम्मीद करतारे, उ बदलाव लगभग इंदिरा के कांग्रेस वाला नीहन बा। सोनिया के कांग्रेस में जहां 50 साल से ऊपर के उमर अवुरी अंग्रेज़ी बोलेवाला लोग के बोलबाला रहे, उहें टीम राहुल में शामिल लोग के औसत उमर 40 साल के आसपास बा। हाँ, ए टीम में जादे संख्या हिन्दी बोलेवाला लोग के बा।

लोकसभा चुनाव से पहिले के कांग्रेस जहां धरना-प्रदर्शन के भुला गईल रहे अवुरी धरना देला के चलते अरविंद केजरीवाल के 'धरना कुमार' क़हत रहे, उहें राहुल के कांग्रेस आज ज़ोर-शोर से धरना-प्रदर्शन करतिया।

जानकार एक ओर मानतारे कि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के लोकप्रियता में लगातार गिरावट आवता, त दोसरा ओर राहुल गांधी के जनता के बीच आए-जाए से इनिकर लोकप्रियता बढ़ता। हालांकि दुनो नेता के लोकप्रियता में अबहूँ बहुत फर्क बाटे।

कुल मिलाके राहुल गांधी ठीक ओही राह प चलतारे, जवना प इंदिरा चलल रहली, अब बस इंतज़ार बा ओ चमत्कारी क्षमता के, जवन कि इंदिरा में रहे। हालांकि अधिकांश जानकार ए मामला में राहुल के कमजोर मानतारे लेकिन भविष्य केहु के देखल ना होखेला।

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