नोटबंदी के मार से किसान बेहाल, फसल ना त बेचाता, ना बोवाता, बियाह-शादी ठप्प होखे के कगार प

सरकार के दावा बा की नोटबंदी से कालाधन प लगाम लगावे में मदद मिली, लेकिन ओकरा से पहिले कारोबार अवुरी घर-परिवार प लगाम लाग गईल बा।

सरकार के दावा बा की नोटबंदी से कालाधन प लगाम लगावे में मदद मिली, लेकिन ओकरा से पहिले कारोबार अवुरी घर-परिवार प लगाम लाग गईल बा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 अवुरी 1000 के नोट बंद करे के फैसला के बाद आज देश के तमाम वर्ग अवुरी क्षेत्र भारी परेशानी के दौर में देखाई देता। हालांकि, सरकार के दावा बा की एकरा से कालाधन प लगाम लगावे में मदद मिली, लेकिन ओकरा से पहिले कारोबार अवुरी घर-परिवार प लगाम लाग गईल बा।

सरकार के ए फैसला के बाद ओईसे त सभ केहु हैरान अवुरी परेशान देखाई देता लेकिन सबसे खराब असर गांव देहात में रहेवाला किसान अवुरी मजदूर प देखाई देता। आज अधिकांश इलाका में धान के फसल कटाई खाती तैयार बिया अवुरी गेंहू के फसल बोवे के तैयारी होखता, लेकिन नोट के कमी के चलते एक ओर तैयार फसल के बिक्री प सवाल बा त दोसरा ओर अगिला फसल खाती खाद-बिया ना मिले से किसान हलकान होखे लागल बा।

बिहार के भोजपुर-बक्सर के हेठार (पटना-मुगलसराय रेल लाइन के दाहिना इलाका के क्षेत्र) के अधिकांश गांव में दशहरा के दिन समहुत होखला के बाद छठ के बाद पूरा ज़ोरशोर से बोवाई होखे लागेला, लेकिन इहाँ के लोग खेत के जोताई-बोवाई छोड़ के बैंक के लाइन में खाड़ा बाड़े। लगभग इहे हाल बलिया-गाज़ीपुर के लोग के बा।

एह इलाका के जवन किसान धान के खेती कईले बाड़े, उ लोग अब मजदूर के कमी से परेशान बाड़े, जहां कही फसल कटा गईल बिया उहाँ के लोग धान के खरीददार ना होखे से परेशान बाड़े। इहाँ के अधिकांश बैंक सिर्फ पुरनका नोट के जमा करावता, देवे खाती ओकरा लगे कुछ नईखे। हालांकि कहीं-कहीं बैंक से पईसा मिलता, लेकिन ओकर सीमा भी मात्र 2000 रुपया बाटे।

जे केहु ए इलाका में गईल बा, चाहें ए इलाका के जानकार होई, ओकरा मालूम होई कि ए इलाका के अधिकांश गांव में बैंक नईखे, अवुरी जवन बैंक बा ओ सभ में साधारण स्थिति में भी भारी भीड़ होखेला। एहसे आज के हालत के कल्पना तक सच्चाई से कम होई।

आज ए इलाका के किसान लगे 500 अवुरी 1000 के नोट त बा लेकिन ए सभ स्थिति के चलते उ खाद-बिया के संगे-संगे अपना रोजाना के जरूरत खाती भगवान के भरोसे हो गईल बा।

गाजीपुर-बक्सर-बलिया में राष्ट्रीय राजमार्ग 84 अवुरी बलिया-गाजीपुर रोड से सटल अधिकांश गांव के किसान सब्जी के खेती करेले। लेकिन, नोट के कमी के चलते खेत में तैयार हरियर तरकारी के केहु खरीदे वाला नईखे। बक्सर ज़िला के कृष्णाब्रह्म के नजदीक से एक दिन में औसतन 10 से 20 ट्रक सब्जी के उठाव होखत रहे, लेकिन आज एकर संख्या 2 से 3 प आ गईल बा।

असही गाजीपुर-बलिया के भांवरकोल अवुरी मछटी चट्टी से रोजाना दर्जन भर ट्रक प सब्जी लोड होखत रहे। लेकिन नोटबंदी के बाद मुश्किल से एक ट्रक सब्जी के उठाव होखता। पूरा तरीका से नकदी प आधारित इ कारोबार अब उधार के भरोसे चलता। लेकिन, उधार-उधार होखेला।

याद रहे कि इ इलाका बिहार अवुरी पूर्वी-उत्तर प्रदेश के समृद्ध इलाका मानल जाला अवुरी ए इलाका के समृद्धि के प्रमुख कारण खेतीबाड़ी बाटे।

अयीसना में एक ओर त तैयार फसल के खरीददार नईखे, दोसरा ओर नयकी फसल के बोवाई में देरी होखता। दु फसल के भरोसे रहेवाला ए इलाका के हाल नकदी के बिना बेहाल हो चुकल बा।

ए इलाका के अनाज के सबसे बड़ मंडी – बिहियाँ, पिरो, डुमरांव अवुरी मुहमदाबाद में सन्नाटा बा। आमतौर प अनाज के ग्राहक अवुरी बिक्रेता से जाम रहेवाला ए सभ बाज़ार में भीड़ नाम मात्र के रह गईल बिया। दोकानदार अवुरी ग्राहक – दुनो लगे नयका नोट नईखे। हाँ ए बाज़ार में जवन-जवन बैंक बा ओकरा सोझा खूब बड़े-बड़े लाइन लागल बा।

बिहियाँ के एगो बैंक में नोट बदले आईल एगो किसान रजिन्दर राय कहले, "सरकार के नोटबंदी के फैसला हमनी के जान के फंसरी (फांसी) बन गईल बा। अगिला महीना हमरा बेटी के बियाह बा, जवन कि धान के फसल के भरोसे तय कईले रहनी, लेकिन नोट के कमी से केहु हमरा फसल के नगदे (नकद) खरीदे के तैयार नईखे। सभ व्यापारी फरवरी-मार्च में पईसा देवे के वादा प धान खरीदतारे।"

रजिन्दर आगे कहले, "सोचले रहनी कि धान बेच के बेटी के बियाह अवुरी गेंहू के खेती क देब, अब दुनो प अकाल पर गईल बा। बैंक में 2 दिन खाड़ा भईला प 2 हज़ार के नयका नोट मिलल बा। एकरा से खाद-बिया खरीदी की घर के खर्चा चलाई? एके बेटी बिया, बहुत अरमान से ओकर बियाह ठीक कईले बानी लेकिन लागता कि अरमान पूरा ना होई।"

डुमरांव में बैंक के लाइन में खाड़ा सिद्धनाथ कुंवर कहले – "हमनी के घर में केहु नोकरीहा (नौकरी करेवाला) नईखे। पूरा परिवार खेती के भरोसे बा। हम, हमार बेटा खेती में बानी। आज हमनी के खेत में रहल चाहत रहे, लेकिन देखते बानी कि खेती छोड़ घर के खर्चा खाती बैंक के लाइन में बानी। अब बताई कि इ दु-चार हज़ार रुपया से खेती करी कि घर चलाई?"

कुंवर आगे कहले – "हमनी के इहाँ धान ना बोवाला, गेंहू-मसूर-चना के भरोसे पूरा साल के खेती बिया, गाई प अच्छत (गोवेर्धन पुजा/भाई दूज) परला के संगे जोताई-बोवाई शुरू हो जाला। लोग हाली-हाली खेतीबाड़ी के काम पूरा क के बियाह-शादी के फेरा में लाग जाले। केहु के घर बरियात आवेले त केहु के तिलक-बियाह के दिन धराए लागेला, लेकिन अबकी साल सभ चौपट हो गईल। ना खेती होई ना बियाह होई।"

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