जब समूचा कालाधन रद्दी होखेवाला रहे त सरकार काहें मेहरबानी करतिया

जब समूचा कालाधन रद्दी होखेवाला रहे त सरकार काहें मेहरबानी करतिया

नोटबंदी के मात्र 21 दिन बाद अयीसन का भईल कि सरकार कालाधन राखे वाला लोग के लालच देवे प मजबूर हो गईल? काहें खाती 'आयकर कानून संसोधन विधेयक' आईल? जब समूचा कालाधन रद्दी होखेवाला रहे त सरकार कालाधन राखेवाला प एतना मेहरबान काहें हो गईल? सवाल मुश्किल बा, जवाब के सिर्फ अंदाज़ा लगावल जा सकता। पक्का तौर प कुछूओ नईखे कहल जा सकत।

पहिले ए कानून के बारे में जान लिही। ए कानून के तहत कवनो आदमी कतनों रकम (कालाधन) अपना खाता में जामा क के, जदी अढ़ाई लाख से ऊपर के रकम प टैक्स अवुरी जुर्मना के रूप में 49.9 प्रतिशत अदा क दिही त सरकार ओकरा से कुछूओ ना पुछी अवुरी ओकर बाकी बाचल पईसा सफ़ेद हो जाई। हालांकि बाकी बाचल रकम के आधा रकम चार साल तक सरकार लगे रही, लेकिन चार साल बाद इहो रकम ओ आदमी के दे दिहल जाई।

अंतिम सूचना के मुताबिक नोटबंदी के लागू होखला के बाद से बैंक में करीब 10 लाख करोड़ रुपया जमा हो चुकल बा। बतावल जाता कि नोटबंदी लागू होखे से पहिले करीब 17 लाख करोड़ रुपया के 500 अवुरी 1000 रुपया के नोट उपलब्ध रहे, जवना में से करीब तीन लाख करोड़ रुपया के नोट बैंक में रहे अवुरी करीब चौदह लाख करोड़ रुपया के नोट बाज़ार में रहे।

सरकार नोटबंदी के भ्रष्टाचार, नकली नोट, आतंकवाद अवुरी कालाधन के खिलाफ लड़ाई करार देले रहे। देश के गरीब जनता सोचत रहे कि अब कालाधन वाला लोग के खैर नईखे, ओ लोग के काला कमाई अब माटी हो जाई। लेकिन अभी तक के नतीजा बतावता कि नोटबंदी अभियान अपना मकसद में पिछड़ रहल बा। कालाधन वाला लोग तेजी से अपना काला कमाई के सफ़ेद करतारे।

देश के अधिकांश बैंक मानता कि अभी तक के जतना पईसा जमा भईल बा ओकरा में से 90 से 95 प्रतिशत रकम बैंक से निकल जाई। कालाधन वाला लोग 10 प्रतिशत से लेके 40 प्रतिशत तक के कमीशन प नोट बदलतारे, आतंकवाद में बढ़ोतरी देखे के मिलता, 2000 के नकली नोट तक बाज़ार में आ गईल बा अवुरी भ्रष्टाचार जस से तस जारी बा।

ए स्थिति में सरकार के हाथ लगभग खाली रह जाए के उम्मीद बा। पहिले सरकार के अनुमान रहे कि करीब चौदह लाख करोड़ रुपया में से कालाधन के करीब पांच लाख करोड़ रुपया बैंक में ना पहुंची। अब जबकि पहिला 22 दिन में करीब 10 लाख करोड़ रुपया के नोट बैंक में पहुँच चुकल बा त अंदाज़ा बा कि करीब एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया के अयीसन पुरनका नोट होई जवन कि बैंक से दूर रही।

मतलब? सरकार अपना अंदाज़ा में पूरा तरीका से चूक गईल बिया। जहां पांच लाख करोड़ के अंदाज़ा रहे, उहाँ अब एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया हो गईल बा। जदी पांच लाख करोड़ रुपया के नोट बैंक में ना पहुंचित, त एकरा बदला में नाया नोट छाप के अपना खज़ाना में ध लीहीत। मतलब सरकार के पूंजी पाँच लाख करोड़ रुपया बढ़ जाईत। अब इ अनुमान एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया के बीच बा।

आखिरकार साढ़े तीन लाख करोड़ रुपया कहाँ चल गईल? ए सवाल के जवाब में दु प्रकार के तर्क बा। पहिला, नकदी के रूप में जमा कालाधन के सही अंदाज़ा सरकार के लगे नईखे। दूसरा, बहुत बड़ रकम बैंक के माध्यम से सफ़ेद हो चुकल बा। हालांकि आयकर विभाग अढ़ाई लाख से जादे रकम जमा होखेवाला खाता प नज़र रखले बा, लेकिन कुछ ठोस निकले के आशा बहुत कम बा।

अब सरकार के कहनाम बा कि देश में करीब 3 लाख करोड़ रुपया के कालाधन नकदी के रूप में बा। विशेषज्ञ ए आंकड़ा तक प भरोसा नईखन नईखन करत लेकिन कहतारे कि जदी अयीसन बा तबहूँ करीब एक लाख करोड़ अलग-अलग माध्यम से सफ़ेद हो चुकल बा। बाकी बाचल 2 लाख करोड़ तक पहुंचे में बहुत समय लागी अवुरी हो सकता कि पूरा पईसा पकड़ से बाहर हो जाए।

ए स्थिति में सरकार के साख प बहुत बाउर असर पड़ी। राजनीतिक रूप से इ स्थिति आत्महत्या कईला नीहन हो जाई। सरकार एही स्थिति से बाचे खाती 'आयकर कानून संसोधन विधेयक' ले आईल। सरकार के कोशिश बा कि ओकर हाथ एकदम खाली मत रहे। कुछूओ अयीसन होखे, जवना के उ जनता के देखावे पावे।

काहेंकी, जदी हाथ खाली रही त जनता सवाल करी कि – "समूचा देश के बैंक के लाइन में काहें खाती खाड़ा कईल गईल? जनता के परेशान क के सरकार के का मिलल?"

एही सवाल से बचे खाती सरकार कानून में बदलाव कईलस अवुरी अब कोशिश बा कि कम से कम 2 से अढ़ाई लाख करोड़ रुपया त कालाधन के रूप में घोषित हो जाए। हालांकि सरकार के एकरा से सिर्फ एक से सवा लाख करोड़ रुपया के फायदा होई, लेकिन जनता के बीच चेहरा छुपावे के जगह मिल जाई। जदी इहो योजना नाकाम भईल त का होई?

कहाँ गईल देश के कालाधन? पहिले त जान लीही कि देश के अधिकांश कालाधन नकदी के रूप में नईखे। देश में कालाधन के अधिकांश खपत जमीन, सोना, शेयर समेत अलग-अलग क्षेत्र में होखेला।

जवना पईसा के सरकार कालाधन कहतिया, चाहे कालाधन मानत रहे, ओकर बहुत बड़ हिस्सा (करीब 55 से 60 प्रतिशत) बाज़ार में एक हाथ से दूसरा हाथ जाए वाला रकम ह। माने टैक्स के चोरी त बा, लेकिन उ अयीसन पईसा ह जवना व्यापारी एक दूसरा के देवेले-लेवेले। ए पईसा के बैंक में पहुंचे खाती मात्र दु से तीन के समय चाही अवुरी व्यापारी अपना खाता में देखा के बैंक में जामा क दिही।

सरकार ए रकम के खिलाफ कवनो कार्रवाई ना करे पाई, काहें कि इ पूरा रकम ओकर आय ना ह, एकर बड़ हिस्सा अगिला पड़ाव प चेक से चल जाई।

जनधन योजना में खुलल करोड़ो लोग के खाता के सरकार कालाधन खपावे के माध्यम बतावतिया, संगही कहतिया कि ए प्रकार के खाता में करीब 27 हज़ार करोड़ रुपया जामा भईल बा। सवाल बा कि जदी चार-पांच लाख करोड़ रुपया में से जदी 27 हज़ार करोड़ रुपया जनधन खाता में चल गईल त बाकी के पईसा कहाँ गईल? एहीसे कम कहतानी कि सरकार नकद कालाधन के अंदाज़ा लगावे में चूक गईल बिया।

एही सभ पेंच के चलते सरकार अब आपन मुंह देखावे लायक कुछूओ पावल चाहतिया।

अब सवाल बा कि जदी डेढ़ लाख से दु लाख करोड़ रुपया के बीच कालाधन के घोषणा होखता अवुरी सरकार के एकरा से एक से सवा करोड़ लाख रुपया टैक्स अवुरी जुर्माना के रूप में मिलता त देश में कतना बदलाव होई?

देखाई देवे लायक कवनो बदलाव ना होई! जान लिही कि आगरा से लखनऊ तक के 302 किलोमीटर लंबा 'एक्सप्रेसवे' के लागत करीब 15 हज़ार करोड़ रुपया बा। मतलब आज के हालत में करीब 1500 किलोमीटर लंबा सड़क बन सकता। एकरा से जादे के उम्मीद बेकार बा।

लेकिन नोटबंदी से जवन घाटा होखता अवुरी होई ओकरा मुक़ाबले कालाधन से मिलल एक-डेढ़ लाख करोड़ के रकम बहुत छोट बाटे। आज करीब 110 करोड़ रुपया के घाटा रोज अकेले राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के टोल टैक्स के रूप में होखता। वैट, उत्पाद शुल्क, चुंगी, केंद्रीय बिक्री कर समेत आयकर में होखेवाला घाटा के आंकड़ा अभी उपलब्ध नईखे।

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