आज भोजपुरी लोकगीत के संक्रमण काल चलता, लोग गंदा संगीत के पसंद करतारे: शारदा सिन्हा

आज भोजपुरी लोकगीत के संक्रमण काल चलता, लोग गंदा संगीत के पसंद करतारे: शारदा सिन्हा

भोजपुरी के लोकगीत खास तौर प पूर्बी के नया ऊंचाई तक पहुंचावे वाली पद्मश्री शारदा सिन्हा के कहनाम बा कि आज के पीढ़ी सस्ता अवुरी सहज संगीत के फेरा में गंदा अवुरी अश्लील संगीत के पसंद करतिया।

भोजपुरी, मैथिली, मगही, बज्जिका समेत आधा दर्जन से अधिका भाषा अवुरी बोली में गावे वाली शारदा सिन्हा मथुरा में कहली कि आज लोकगीत के संक्रमण (बेमारी) काल चलता। आज के लोग सहज-सुगम संगीत के फेरा में फूहड़ गीत-संगीत के पसंद करतारे। अयीसन हालत हमनी के समाज खाती बहुत खराब अवुरी घातक बा।

उ कहली कि, आज के नयकी पीढ़ी के नईखे पाता कि हमनी के संगीत परंपरा कतनी उन्नत किस्म के रहल बा। शारदा सिन्हा कहली कि लोक संस्कार के गीत के गांव देहात के चारदीवारी से बहरी निकालल उनुका खाती सबसे बड़ चुनौती रहे। उ कहली कि हमनी के महान संगीत परंपरा के बारे में नयकी पीढ़ी के बतावल हमनी के कर्तव्य बा। जदी हमनी के अपना कर्तव्य के निबाहे में कोताही करे के त आज के पीढ़ी बाजारू गीत-संगीत के आपन संगीत माने लागी।

आकाशवाणी के मथुरा-वृन्दावन केंद्र के ओर से अमरनाथ शिक्षण संस्थान में आयोजित एगो कार्यक्रम में भोजपुरी लोकगीत के प्रस्तुति खाती पहुंचल शारदा सिन्हा के 1979 में एचएमवी कंपनी के ओर से साल के सर्वश्रेष्ठ कलाकार, 1987 में बिहार गौरव, 1988 में भोजपुरी कोकिला अवुरी बिहार रत्न, 1991 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कईल गइल।

फिल्म से जुडल अपना अनुभव के बतावत शारदा सिन्हा कहली कि फिल्म में गावत समय उ कबहूँ सस्ता लोकप्रियता के लोभ ना कईली। ना कबहूँ गीत से समझौता कईली। उनुका ए रुख के चलते बहुत बेर उनुका हाथ के मौका निकलल लेकिन उ अजूओ अपना रुख प कायम बाड़ी अवुरी खुशी बा कि श्रोता उनुका के अजूओ याद रखले बाड़े।

बियाह, छठ समेत अलग-अलग मौका प गावल जाए वाला पारंपरिक गीत खाती अभियो पहिला पसंद के रूप में गिनाए वाली बिहार के दरभंगा जिला के मूल निवासी शारदा सिन्हा कहली कि संस्कार गीत के आंगन से बहरी निकाल के आम जनता तक पहुंचावल उनुका जीवन के मूल मकसद बा। जब लोग बियाह-तिलक अवुरी छठ पूजा जईसन मौका प गावल जाए वाला गीत के गावेले त उनुका संतोष मिलेला अवुरी लागेला कि उनुकर तपस्या सफल हो गइल।

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