बिहार में बेशर्म बने के कॉम्पटिशन होखता, नेता अपना 'चटक बयान' से असली सवाल दबावतारे

बिहार में बेशर्म बने के कॉम्पटिशन होखता, नेता अपना 'चटक बयान' से असली सवाल दबावतारे

बिहार के राजनीति में रसातल में जाए से रोकल फिलहाल मुश्किल बुझाता। एक ओर 'भूरा चूहा' बाटे, त दोसरा ओर 'मानसिक रोग' अवुरी तीसरा ओर 'मूड़ी कटवा' बाटे। बिहार के राजनीति के सबसे बाउर समय शायद अब आ गईल बा।

हालांकि पछिला 30-35 साल में 'भूरा बाल साफ करो', ‘हारेंगे तो हूरेंगे, जीतेंगे तो थूरेंगे' अवुरी ना जाने बिहार के जनता का-का सुनलस। देखबो कईलस। लेकिन पहिले एक-आध आदमी अयीसन अनाप-शनाप बोलेवाला रहले।

आज लागता कि मर्यादा के बलात्कार करेके के कॉम्पटिशन चलता। केहु पागल कहता, केहु औकात देखावे के बात कहता, केहु मूड़ी काटे के धमकी देता, केहु चीटर कहता, त केहु एक जाति के नेता बतावे लागता। केहु के फोटो देखा के सवाल पुछल जाता, त केहु ट्रेन के नाम प सवाल करता।

कुल मिलाके मुद्दा अवुरी सवाल एके बा। एक दूसरा के चरित्र के खराब कईसे बतावल जाए। बस बहिन-महतारी के गारी बाकी रह गइल बा। लेकिन जवना रफ्तार से मर्यादा के बांध ढहता, शर्म-लिहाज के पीअल जाता, ओतना रफ्तार त ओ चूहा के भी ना रहे, जवन कि बांध तुरलस, आ लाखों लीटर शराब पी गइल।

घोटाला-प-घोटाला होखता, लगभग पूरा बिहार में विकास के कामकाज ठप्प बा, बलात्कार अवुरी लूट-मार चरम प बा। एगो बढ़िया खबर खाती मन छछन के रह जाता। लेकिन एकर चिंता ना विपक्ष के बा, ना सत्ता पक्ष के। दुनो त सबसे बड़ बेशर्म कहाए के कॉम्पटिशन कईले बा।

राजनीति के मतलब होखेला राज्य के हक में बने वाली नीति। जब-जब कवनो घोटाला सोझा आवता त सत्ता पक्ष विपक्ष के गारी देवे शुरू क देता। जब तनिका शांति होखता त विपक्ष गरियावे लागता। गारी देवे के ए कॉम्पटिशन में असली सवाल आत्महत्या क लेता। इ नईखे पाता चलत कि सृजन घोटाला के पईसा कहाँ गइल? स्कूल में लईका फेल काहें होखतारे? शराबबंदी के बावजूद जहरीला शराब पी के लोग मरत काहें बाड़े?

सवाल इहों नईखे कि के बेसी करता अवुरी के कम। सवाल इ बा कि काहें करता। एक मिनट खाती मान लिहल जाए कि विपक्ष अपना के सार्थक राखे खाती अनाप-शनाप बोलत रहता। सत्ता पक्ष कवना कारण से आपन काम-धाम छोड़के विपक्ष से एक डेग आगे रहे के प्रयास करता?

लेकिन विपक्ष अपना के सार्थक राखे खाती अनाप-शनाप काहें बोलता? का ओकरो खाती घोटाला, बेरोजगारी, महंगाई अवुरी आम जनता के परेशानी के अब कवनो मोल नईखे? का ट्रेन के नाम काहें धराईल के जवाब मिलला से जनता के परेशानी दूर हो जाई?

आज के राजनीति के दुर्भाग्य बा कि जनता नाम के कवनो चीज़ नईखे रह गइल। हरेक दल अवुरी नेता के समर्थक आज कार्यकर्ता बन गइल बाड़े अवुरी शायद सबसे बड़ दुश्मन भी। केहु के इ नईखे समझ में आवत कि 'भूरा चूहा' अवुरी 'पागल' कहे वाला नेता असल में ओ लोग के हक मारतारे अवुरी ओ लोग के 'चटक-चटक बात' में अझुरा के अन्हारा में ढ़केलतारे।

जानतानी कि हमरा कहला अवुरी समझावला से केहु ना समझी, लेकिन जदी हमरा लगे अयीसन लोग वोट मांगे अईंहे त एक बेर जरूर पुछब, “लईकिया वाला फोटउवा से कतना लोग के रोजगार मिलल? अर्चना एक्सप्रेस के नाम जनला से हमरा कवन फायदा भईल?” इहो पुछब कि "कवन चूहा बांध ढहले रहे अवुरी कवन चूहा शराब पी गइल?”

जदी मौका मिले त आप लोग भी पूछी। पूछी कि हमरा, हमरा भाई चाहे बेटा के नोकरी काहें ना मिलल? लाखों छात्र मैट्रिक-इंटर में काहें फेल होखतारे? घोटाला काहें भईल अवुरी के-के ओकर मलाई खईलस? गरीब के नेता लगे अरबों के संपत्ति कवना फ़ैक्टरी के कमाई से आइल?

लोकतन्त्र में राजनीति अवुरी राजनेता के केंद्र में जनता होखे के चाही, जनता के हमेशा अपना प्रतिनिधि से सवाल करत रहे के चाही। सवाल कईला से राजनेता, राजनीति अवुरी जनता तीनों के भलाई होई। लेकिन हमनी के त सवाल पुछले छोड़ देले बानी। जनता के सवाला के डर कईसन होखेला इ जाने के होखे त पूरा देश प राज करत सबसे बड़का नेता के देखीं। जवाब देवे से आज तक जनता से दुतरफा बात ना कईले। हमेशा अपना मन के बात कहले।

एही से कहतानी, जदी बिहार के बचावे के होखे त नेता के निजी जीनिगी में रुचि लिहल बंद करी अवुरी अपना जीनिगी में रुचि लिही। आप अपना जीनिगी में रुचि लेब त आपन फायदा-नुकसान के चिंता करब, नेता के जीनिगी में रुचि लेब ओकर फायदा-नुकसान के चिंता करब। सोची-समझी, काहेंकी जीनिगी आपके ह।

  • Share on:
Loading...