'खाई के मगहिया पान, ए राजा हमरी जान लेब का हो ...' पान के किसान के सवाल

बिहार के मगध क्षेत्र के चार ज़िला, नवादा, नालंदा, गया अवुरी औरंगाबाद में करीब पांच हज़ार किसान पान के खेती करेले।

बिहार के मगध क्षेत्र के चार ज़िला, नवादा, नालंदा, गया अवुरी औरंगाबाद में करीब पांच हज़ार किसान पान के खेती करेले।

पान के भारत के संस्कृति के प्रमुख स्थान बा। पान खाये से लेके पुजा तक में इस्तेमाल होखेला। हिन्दू के कवनो धार्मिक अनुष्ठान पान के पत्ता बिना ना होखे। बात जब मगही पान के होखे त का कहे के बा। पान के तमाम प्रकार में मगही के सबसे बढ़िया मानल जाला अवुरी एकर कीमत बाकी किस्म से बहुत जादे होखेला।

ओईसे त भारत में बहुत जगह पान के खेती होखेला लेकिन बिहार के मगह (मगध) में होखेवाला मगही पान के विशेष स्थान बा। मगह के चार ज़िला, नवादा, नालंदा, गया अवुरी औरंगाबाद में करीब पांच हज़ार किसान पान के खेती करेले।

नवादा में पान के खेती मंझवे, तुंगी, बेलदारी, ढेउरी, कैथी हतिया, पचिया, नारदीगंज, छत्तरवार डोला अवुरी डफलपुरा में होखेला जबकि नालंदा के बौरी, कोचरा, जौए अवुरी डेउरा सरथुआ, औरंगाबाद के देव प्रखण्ड आ गया के आमस अवुरी बजीरगंज प्रखण्ड में पान के खेती प विशेष ज़ोर बाटे।

पान के खेती करेवाला अधिकांश लोग चौरसिया "बरई" वर्ग से आवेले। एगो पौराणिक कथा के मुताबिक प्राचीन काल में ऋषिमुनी जब पहिला बेर धरती प विष्णु यज्ञ करे चलले त ओ लोग के सोझा एगो समस्या खड़ा हो गइल। यज्ञ खाती ओईसे त धरती लगभग सब चीज़ उपलब्ध रहे, लेकिन पान ना रहे। पान के बिना यज्ञ पूरा ना हो सकत रहे अवुरी पान सिर्फ नागलोक में उपलब्ध रहे।

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पान के खेती में बांस, नारियल के रस्सी, मूंज अवुरी पूअरा (पुआल) के जरूरत पड़ेला। हरेक 15 दिन प कीटनाशक छींटल जाला। एक साल में करीब 80 बेर सिंचाई जरूरी बा।

यज्ञ करेवाला लोग ए समस्या के देखत "चौॠषि" (चौर ऋषि) नाम के एगो ॠषि के बेटा के पान ले आवे बदे नागलोक भेजले अवुरी उ तमाम प्रकार के परेशानी के सहत आखिरकार नागलोक से पान के धरती प ले अईले। तबहिए से धरती प पान के खेती शुरू भईल। पान के खेती करेवाला अधिकांश लोग के संबंध "चौॠषि" के वंश से बा अवुरी इहे लोग आगे चलके चौरसिया कहाए लगले।

आज एही "चौऋषि" के अधिकांश वंशज बदहाली अवुरी बरबादी के कगार प बाड़े। ए लोग के सोझा सबसे बड़ सवाल भविष्य के बाटे। खेती के बढ़त लागत अवुरी बाज़ार में घटत मांग के संगे-संगे प्राकृति के मार अब ए लोग के सोचे प मजबूर क देले बिया। बहुत लोग अब पान के खेती छोड़ देले बाड़े त बहुत छोड़े के सोचतारे।

नवादा जिला के हिसुआ प्रखण्ड के ढेउरी निवासी दिनेश चौरसिया समेत 100 से अधिक किसान करीब 50 एकड़ में मगही पान के खेती करेले। इ खेती ए लोग के अपना बाप-दादा से विरासत में मिलल बा।

दिनेश के मुताबिक पान के खेती खाती जमीन के चुनाव बड़ा सोच-समझ के करे के पड़ेला। ऐके खेत में हर साल पान के खेती नईखे हो सकत, एहसे हर साल अलग जमीन प पान के खेती होखेला। अयीसन जमीन चुने के पड़ेला जहां बरसात के पानी तक मत जमा होखे अवुरी सिंचाई के साधन भी होखे। बिना सिंचाई के पान के खेती संभव नईखे।

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पान बहुत कोमल होखेला, ऊपर से मगही पान के त बाते अलग बा। मगही पान गर्मी, जाड़ा अवुरी बरसात में खराब होखे लागेला, एहसे एकरा के मौसम के मार से बचावल बहुत जरूरी बा।

उ कहले कि पान के खेत के कोड़ला (कुदाल से माटी पलटल) के बाद चौरस कईल जाला अवुरी पति कट्ठा 15 किलो सरसों के खल्ली में 2 क्विंटल गोबर के खाद मिला के डालल जाला। दिनेश बतवले कि "पान के खेती में बांस, नारियल के रस्सी, मूंज अवुरी पूअरा (पुआल) के जरूरत पड़ेला। हरेक 15 दिन प कीटनाशक छींटल जाला। एक साल में करीब 80 बेर सिंचाई जरूरी बा। जदी गर्मी जादे होखे से जादे सिंचाई के जरूरत होखेला। ए हिसाब से एक कट्ठा जमीन में पान के खेती के लागत करीब 30-35 हज़ार रुपया आवेला।"

सबकेहु जानता कि पान बहुत कोमल होखेला, ऊपर से मगही पान के त बाते अलग बा। मगही पान गर्मी, जाड़ा अवुरी बरसात में खराब होखे लागेला, एहसे एकरा के मौसम के मार से बचावल बहुत जरूरी बा।

नवादा के कैथी निवासी जगदीश अबकी साल 7 कट्ठा में पान के खेती कईले बाड़े। जगदीश बतवले कि "जब गर्मी के लूक (लू) चलेला त लोग घर में सटक जाले, लेकिन हमनी के सांस-परान खेत में टंगाईल रहेला। गर्मी बढ़ते पान प लगातार पानी छींटे के पड़ेला। तनिका आँख ऐने-ओने भईल त सब तबाह हो जाई।"

गर्मी में जहां पान के पत्ता सड़ जाला उहें सर्दी में इ सुख जाला आ करिया हो जाला।जगदीश कहले कि "गर्मी में त पानी छींट के पान के बचावल जा सकता लेकिन जब जाड़ा में शीतलहर चलेला अवुरी तापमान 5 डिग्री से कम हो जाला त हमनी के वश ना चलेला। अयीसन हालत में पान के बचावल लगभग असंभव बा। इहे हाल तेज बरखा अवुरी आँधी-तूफान के समय होखेला।"

अबकी के शीतलहर में बर्बाद भईल अपना फसल के देखावत नालंदा के सरथुआ निवासी रमेशर कहले, "हम आठ कट्ठा में पान के खेती कईले रहनी। दु-तीन महीना में पत्ता टूटे वाला रहे, लेकिन अब सबकुछ खतम हो चुकल बा। शीतलहर से पान के जड़ सूख गइल बा, पत्ता बहुत छोटे-छोटे बा। एकनी के केहु ना खरीदी। 3 लाख से जादे के नुकसान हो गईल।"

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एक कट्ठा में औसतन 500-600 ढोली पान के पैदावार होखेला। हरेक ढोली में 200 पत्ता होखेला। हरेक पत्ता के औसतन कीमत 50-60 पईसा होखेला। ए भाव से हरेक कट्ठा प किसान के 20-30 हज़ार रुपया के फायदा होखेला।

पान के खेती करेवाला अधिकांश किसान अबकी साल परेशान बाड़े। केहु कर्जा चुकावे के चिंता में गलल जाता, त केहु पान के खेती से तौबा करता। केहु दोसरा जगह कमाए जाए के फेरा में बा। सवाल बा कि सबके मुंह लाल करेवाला किसान के चेहरा से लाली काहें उड़ गईल? का ए लोग के खोज खबर लेवे वाला केहु नईखे?

सच्चाई बा कि सैकड़ों प्रकार के खतरा उठा के पान के खेती करत पान के किसान के ओर पलट के देखे वाला केहु नईखे। केंद्र सरकार अवुरी बिहार सरकार किसान के नाम प तमाम प्रकार के घोषणा करतिया, बीमा होखता, लेकिन पान के खेती अवुरी पान के किसान खाती केहु लगे कुछ नईखे। पान के खेती प ना त कवनो प्रकार के सब्सिडी मिलता, ना बीमा होखता (फसल बीमा योजना में पान के खेती के बीमा के कवनो प्रावधान नईखे), ना फसल बर्बाद होखला मुआवजा दिहल जाता। किसान के भविष्य भी पान के पत्ता जईसन नाज़ुक हालत में बाटे।

ए सभके बाद जदी फसल कसहूँ पार लाग गईल त अब बारी बा बाज़ार के। एक कट्ठा में औसतन 500-600 ढोली पान के पैदावार होखेला। हरेक ढोली में 200 पत्ता होखेला। हरेक पत्ता के औसतन कीमत 50-60 पईसा होखेला। ए भाव से हरेक कट्ठा प किसान के 20-30 हज़ार रुपया के फायदा होखेला। लेकिन सबसे बड़ परेशानी बा बाज़ार।

बिहार में अयीसन कवनो मंडी नईखे जहां मगही पान के आधा फसल भी बेचाए पावे। स्थानीय स्तर प मगही पान के नाम मात्र के खपत के चलते एकरा के बेचे खाती बनारस गईल मजबूरी बा। मालूम रहे कि आम तौर प जेकरा के बनारसी पत्ता कहल जाला, असल में उ मगही पान के पत्ता होखेला।

पान के किसान लोग के मुताबिक बनारस में पान बेचल बहुत मुश्किल काम बा। उहाँ के मंडी में बिचौलिया, दलाल अवुरी आढ़तिया के माध्यम से पान के बिक्री होखेला। ऊपर से समय से पईसा भी ना मिले। बनारस में एक टोकरी पान (करीब 50 ढोली, 10,000 पत्ता) के बिक्री प 20 प्रतिशत तक कमीशन देवे के पड़ेला। जहां पान के मंडी लागेला उहाँ रोज के 20 रुपया अलग से देवे के पड़ेला। कुल मिलाके एक ढोली (200 पत्ता) पान प खेती के अलावे सिर्फ तोड़ाई, ढोवाई, कमीशन आदि के लागत करीब 12 रुपया बाटे।

ए सभके बाद बनारस में मगही पान के औसतन कीमत 50 से 60 पईसा के बीच मिलेला। लेकिन इहो पईसा एक संगे ना मिले। खेती के बाकी कारोबार नीहन इहाँ भी बहुत बड़ स्तर प उधार कारोबार होखेला। बनारस के व्यापारी आधा-अधूरा भुगतान क के पान खरीद लेवेले जबकि बाकी पईसा के टुकड़ा-टुकड़ा में देवेले। हालत अयीसन भी आवेला जब किसान के आपन हज़ार-दु हज़ार रुपया व्यापारी के लगे छोड़ देवे के पड़ेला। काहेंकी ए पईसा के लेवे खाती बनारस गईल अपने आप में खर्चीला सौदा बा।

ए सभके देखत फिलहाल त पान के किसान के केहु से कवनो प्रकार के उम्मीद नईखे, लेकिन आस बा कि कहियो हालत बदली। जदी हालत ना बदलल त किसान जरूर बदल जईहे। या त पान के खेती छोड़ के दोसर कवनो चीज़ के खेती करीहे, ना त खेती से साफ मुंह मोड़ लिहे। लेकिन जब तक सांस बा, तब तक आस बा।

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