'फागुन में बुढ़ओ देवर लागें...,' फागुन, फगुआ अवुरी भोजपुरिया होली

'फागुन में बुढ़ओ देवर लागें...,' फागुन, फगुआ अवुरी भोजपुरिया होली

कुमार नरेन्द्र सिंह

फागुन के हावा जब बहे लागेला त पूरा देश के मिजाज आ माहौल बदले लागेला। भोजपुरी भाषी इलाका में त फगुनहटा सभके मस्त क देवेला। मौसम के असर चेहरा प लउके लागेला अवुरी गज़ब के मस्ती रहेला। ए मौसमी बयार से अंग-अंग में थिरकन होखे लागेला।

ओईसे त फगुआ पूरा में देश में मनावल जाला अवुरी ए मामला में भोजपुरी भाषी क्षेत्र के कवनो विशेष महत्व नईखे। सच बात बा कि होली के मामला में जईसन महत्व ब्रज के बा, ओईसन महत्व खाती भोजपुरी भाषी इलाका के ना जानल जाला, लेकिन एतना त तय बा इंहवों होली पूरा जोश के होखेला।

इहाँ फागुन में केहु बड़-छोट अवुरी अमीर-गरीब ना रह जाला, गांव के बड़-बुजुर्ग ढोलक-झाल के संगे जुटेले अवुरी फेर सब मस्त हो जाला। भोजपुरी भाषी इलाका में होली एक दिन के त्योहार ना होखेला, इहाँ होली के मतलब फागुन के पूरा महीना होखेला। बसंत पंचमी से रंग-अबीर उड़े लागेला अवुरी फगुआ के सुर लहरी शुरू हो जाला, जवन कि फागुन के अंतिम दिन तक चलेला । लोग रंग-अबीर अवुरी फगुआ के ताल प डूबत-उतरात रहेले।

गांव के बच्चा अवुरी युवक होलिका जरावे खाती बसंत पंचमी के दिन से इंतजाम शुरू क देवेले। बाग-बगईचा से सुखल लकड़ी जुटावल जाला त लईकन के छोटे-छोटे टोली घरे-घरे जाके लकड़ी, गोइठा जईसन समान जुटावेले। ए काम खाती जब लईकन के टोली केहु के घरे पहुंचेले त उ लोग एगो गीत गावेले, जवना के बोल बा -

ए जजमानिन,
तोहरा सोने के केवाड़ी.....
पांचगो गोइठा द

गोइठा मांगे आईल लईका ए गीत के अलग-अलग अंदाज़ में तब तक गावत रहेले, जब तक ओ लोग के गोइठा ना मिलल रहेला, फेर दोसर दुआर, लेकिन गीत इहे। सबसे मजेदार बात बा कि गोइठा के मांग घर के मालिक से ना होखेला, लईकन के टोली घर के मलकिनी से गोइठा मांगेले। घर के महिला ए मौका के खूब फायदा उठावेली अवुरी खूब देरी तक गीत सुनला के बादे गोइठा देवेली।

कुल मिलाके फागुन सभके अपना रंग चभोर देवेला। हर आदमी में फुर्ती आ गईल रहेला आ अपना के जवान बुझे लागेला। सभके हंसी-ठिठोली के लाइसेंस मिल गईल रहेला। भोजपुरी भाषी इलाका में पूरा फागुन महीना में रोज सांझ के फगुआ गावल जाला, लेकिन एकरा खाती कवनो तय जगह ना होखे, इ कार्यक्रम पूरा गांव में घूम-घूम के होखेला। आज हिनिका दुआर प, त काल्ह हुनुका दुआर प।

रिश्ता-नाता अवुरी दोस्ती-दुश्मनी के केंचुल उतरेला अवुरी लोग हर्ष-उल्लास अवुरी मिठास के कपड़ा पहीर लेवेले। इहे उ मौका होखेला जब काल्ह के आईल बहुरिया तक दुरे से ससुर-भसुर प रंग फेंक के भाग जाले। एही से त कहल बा -

फागुन में बुढ़ओ देवर लागें

असही पूरा महीना बीतेला अवुरी फेर आवेला उ दिन, जेकर इंतज़ार सभके रहेला। होली के दिन सबेरे से लईका, जवान आ लईकिन के टोली गांव में रंग खेले निकल जाला। लोग घरे-घरे ढूक के एक दूसरा के रंग लगावेले अवुरी लगवावेले। हालांकि ए टोली में गांव के पतोह ना होखेली। लेकिन एकरा से कवनो फरक ना परेला।

holi

गांव आ घर के नाता के सभ ननद आ देवर खुद ओ लोग के रंग लगावे पहुंचेले। आज कवनो प्रकार के मनाही ना होखेला, कवनो रोक-टोक ना होखेला। रंग डाले अवुरी डलवावे के इ कार्यक्रम दुपहर तक चलेला। लेकिन एकर शुरुआत पानी-पांकी से भईल रहेला, जवन कि संगे-संगे चलत रहेला। ओईसे अब पानी-पांकी वाली होली कमे देखे के मिलता।

भोजपुरिया होली के पहिला चरण के हुड़दंगई वाली होली कहल जा सकता। दुपहर तक चलेवाली ए होली में ओ बुजुर्ग प सबसे जादे रंग परेला, जवन कि खिसियाह होखे अवुरी रंग डलला प गारी देत होखे। लईकन के टोली जानबूझ के पानी-पांकी अवुरी रंग फेंकेले। जवाब में बुढ़ऊ रंग त ना लगावस, लेकिन गारी खूब देवेले। जदी बुढ़ऊ गारी ना देस त लईकन के सभ मेहनत बेकार हो जाला।

holi

दुपहर के बाद भोजपुरिया होली के दुसरका अध्याय शुरू होखेला। सबेरे रंग आ पानी-पांकी में गोताईल लोग अब नहा-धो के नाया-नाया कपड़ा पहिरेले अवुरी ओकरा बाद हाथ में अबीर के पोटली आ मेवा-मिश्री लेके घर से निकलले। होली के इ चरण बहुत शालीन होखेला। लोग एक दूसरा के घरे जाले अवुरी अपना से बड़ उमर के लोग के गोड़ प अबीर ध के प्रणाम करेले अवुरी मेवा-मिश्री खीआवेले, बदला में दुसकरा आदमी अबीर के टीका लगावेला, मेवा-मिश्री खीआवेला आ आशीर्वाद देवेला।

सबकुछ ओसही होखेला जईसे सबेरे भईल रहेला, बस अब रंग के जगह अबीर होखेला, अबीर लगावे के नियम होखेला अवुरी हुड़दंग ना होखेला। ए चरण के बाद फागुन के बिदाई कार्यक्रम होखेला। लोग अबीर लगावला के बाद ओ आदमी के दुआर प पहुंचेले, जहां से ओ दिन फगुआ के ताल उठे वाला रहेला।

दिन भर के रंग आ पांकी-पानी वाली होली से सनाईल दुआर के साफ क दिहल रहेला। दालान के बहरी कालीन अवुरी दरी बिछावल रहेला। लोग पहुंचेले आ बईठत जाले।फगुआ गावे वाला लोग के टोली आगे बईठेले, बाकी लोग पीछा। लेकिन इहाँ श्रोता केहु ना होखेला। सभ गावेला, सभ बजावेला। आगे वाला सुर साधत शुरू करेला त पीछा वाला लोग एक संगे एक सुर में ओकरा के दोहरावेले। बहुत अद्भुत दृश्य होखेला।

बिना कवनो संगीत निर्देशक, बिना कवनो शिक्षा-ट्रेनिंग, गांव के सैकड़ों लोग एक संगे गावेले अवुरी बजावेले, लेकिन मजाल नईखे केहु के सुर चाहे ताल गड़बड़ा जाए। सैकड़ों साल से इ कार्यक्रम असही, बेरोकटोक चलता अवुरी भोजपुरिया जीवन के हिस्सा बन गईल बा।

एकरे संगे फगुना के महीना के अंत होखेला, फगुआ के अंत होखेला अवुरी चईता आ चईत के चिंता शुरू हो जाला।


बिहार के भोजपुर निवासी कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्ठ पत्रकार हवे अवुरी देश के प्रमुख हिन्दी दैनिक अवुरी टीवी चैनल संगे जुडल रहल बाडे।

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