पछीम से आईल भाषा में अजबे लोग लेटाईल बा

पछीम से आईल भाषा में अजबे लोग लेटाईल बा

पश्चिमी सभ्यता के बाउर असर हमेशा से हमनी के समाज खातीर चिंता के विषय रहल बा। एकरो से बड़का चिंता के बात बा की हमनी के अपना सभ्यता अवुरी संस्कृति अवुरी भूलाईल जातानी। कवि देवेंद्र राय जी एही चिंता के अपना कविता के माध्यम से आपके सोझा रखले बानी -

पछीम से आईल भाषा में
अजबे लोग लेटाईल बा,
आर्यावर्त के अमर सुधा के
आजु सभे भुलाईल बा॥

चईत शुकुल पद नया बरीस ह
होला प्रकृति के नया सिंगार,
चारो देने होला खुशीहाली
कण कण में नूतन अवतार॥

श्यामल धरती अजब सुहाना
फेंड़ रुख लउके अलमस्त,
हर डेग भरल भण्डार रहेला
हर किसान होला मदमस्त॥

पाकल फसल के गंध से
हर खेत देखीं बउराईल बा,
घर के कोठीला भरे खातीर,
उ अजबे अकुताईल बा॥

चईत नवरात पहिला दिन
भारत के भाव देखावेला,
प्रकृति से नाता सभके होला
अईसन ज्ञान सिखावेला॥

चईत नवरात मिल सभे मनावे
मिलजुल के प्रकृति बचावे,
जेकरा से सभे जुड़ल बा एहीजा
ओईसन बिसरल बात बतावे॥

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देवेन्द्र कुमार राय
ग्राम: जमुआँव, पीरो,
भोजपुर, बिहार

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