नरेंद्र मोदी के विपक्ष नईखे हरा सकत, लेकिन तबहूँ हार जईहे!

नरेंद्र मोदी के विपक्ष नईखे हरा सकत, लेकिन तबहूँ हार जईहे!

अप्रैल के शुरुआत में देश के दलित समाज जब रोड-रास्ता जाम क के उत्तर भारत में सरकारी संपत्ति में आग लगावत रहे त कुछ लोग ए घटना के विडियो-फोटो के देखावत पुछत रहले कि इ सभ काहें अवुरी केकरा खिलाफ होखता?

दलित समाज के उग्र प्रदर्शन से पहिले सुप्रीम कोर्ट के एगो आदेश आईल रहे अवुरी केंद्र सरकार एगो कानून बनवले रहे। करीब तीन साल पहिले केंद्र सरकार जहां गौ हत्या के गंभीर अपराध के श्रेणी में शामिल क देले रहे, उहें 2018 में सुप्रीम कोर्ट दलित उत्पीड़न के खिलाफ बनल कानून में कुछ बदलाव क देलस।

एक ओर सरकार के कानून के चलते गाय से जुड़ल कारोबार में जुड़ल लोग पुलिस अवुरी गौ रक्षक के निशाना प आ गईले अवुरी प्रधानमंत्री के 'कट्टर हिन्दू भक्त' गाय के आड़ में जेकरा-सेकरा के पीटे अवुरी मारे शुरू क देले त सुप्रीम कोर्ट के आदेश ओ बारूद में आग लगा देलस जवन कि बहुत दिन से फाटे खाती बेचैन रहे।

हमरा समझ से देश के दलित समाज में पछिला चार साल से एगो आग धधकत रहे, जवना के प्रधानमंत्री के 'सवर्ण भक्त मंडली' लगातार धधकावे के काम करत रहे। ए आग के शुरुआत ऊना के ओ घटना से हो चुकल रहे, जवना में मरल गाय के चमड़ा निकालत कुछ दलित युवक के 'हिन्दुत्व' के ठेकेदार अवुरी कथित 'गौ रक्षक' कार में बान्ह के लोहा के रड़ से पीटले रहले।

हालांकि इहो सभ एक दिन ना भईल। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ा के मुताबिक 2007 से 2017 के बीच दलित के खिलाफ होखेवाली हिंसा में 70 प्रतिशत के बढ़ोतरी भईल बा।

भाजपा अवुरी एकर समर्थक भूला गईले कि गाय अवुरी कर्मकांड में हिन्दू समुदाय के सवर्ण समाज जादे भरोसा करेला, जबकि दलित समाज के ए सभ में खास रुचि ना रहेला। हिन्दू सवर्ण के राम मंदिर के मुद्दा अजूओ लोभावता लेकिन दलित समाज के अधिकांश आबादी के एकरा में कवनो रुचि नईखे।

एक ओर देश में तेजी से बेरोजगारी बढ़त रहे, त दोसरा ओर बाचल-खुचल रोजगार में से एक - गाय-बैल के खरीद-बिक्री पूरा तरीका से ठप्प हो गईल। मांस अवुरी चमड़ा से जुड़ल कारोबार लगभग बंद हो गईल। प्रधानमंत्री के अधिकांश 'कट्टर हिन्दू भक्त' अवुरी कथित 'गौ रक्षक' सवर्ण समाज से आवेले अवुरी सभ केहु जानता कि मांस अवुरी चमड़ा के कारोबार में मुसलमान के अलावे दलित समाज के लोग काम करेले।

चार साल पहिले 'सबका साथ, सबका विकास' के नारा संगे केंद्र के सत्ता में आईल भाजपा सरकार रोजगार अवुरी 'अच्छे दिन' जईसन लोभावन वादा कईले रहे। लेकिन मिलल गौ रक्षा कानून अवुरी दलित उत्पीड़न कानून में बदलाव।

ए मौका प प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप कईल चाहत रहे, लेकिन उत्तर प्रदेश में 'श्मशान-कब्रिस्तान' से मिलल जीत के नशा अयीसन रहे कि उतरे के नाम ना लेत रहे। राजस्थान से शुरू भईल 'गौ रक्षा' के खेल अब तक दूध से लेके मेला-ददरी अवुरी मांस-चमड़ा कारोबार के पूरा तरीका से प्रभावीत क चुकल रहे। लाखों लोग ए प्रकार के कारोबार के भरोसे जीवन बीतावत रहले, लेकिन अब ए लोग के सोझा रोजगार के समस्या खाड़ा हो गईल।

दलित के मामला में प्रधानमंत्री अवुरी भाजपा के चुप्पी एगो बड़ सवाल खाड़ा क देलस। राजस्थान के उपचुनाव अवुरी गुजरात के विधानसभा चुनाव के नतीजा बतावता कि दलित समाज अब भाजपा से दूर होखता। एकर सीधा असर प्रधानमंत्री के साख प भईल।

देश में 'हिन्दुत्व' के नाम प नफरत के कारोबार खूब से तेज़ी से बढ़त रहे। प्रधानमंत्री चुप रहले। शायद उनुका जानकारी ना होई। शायद इहो लागत होई कि हरेक परेशानी खाती जवाहरलाल नेहरू के दोषी बतावला से जनता उनुका एक बेर फेर मौका दे दिही।

भारत में लाखों-करोड़ों मतदाता के एगो अयीसन आबादी बिया जेकरा इतिहास से जादे भविष्य में रुचि बाटे। इहे आबादी सरकार बनावेले अवुरी गिरावेले। ए आबादी के हाथी वाला कहाए खाती सिकड़ लेके घूमे में कवनो रुचि नईखे।

भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास बा कि रोजगार अवुरी हालत में सुधार के वादा प हरेक धर्म-वर्ग एकजुट होके वोट देवेला। देश में 1977 में जब पहिला बेर गैर कांग्रेसी सरकार बनल रहे तब जनता इन्दिरा गांधी अवुरी संजय गांधी से पार पावल चाहत रहे। लेकिन जवना इन्दिरा के हटा के जनता पार्टी के सरकार बनल, ओकरा कथनी-करनी से जनता अयीसन नाराज़ भईल कि 1980 में फेर सत्ता इन्दिरा गांधी के सौंप देलस।

इन्दिरा गांधी के मौत के बाद 1984 में सहानुभूति लहर में बनल राजीव गांधी सरकार जब जनता के अपेक्षा के पूरा ना कईलस त जनता एकरो के बदल देलस। राजीव गांधी के बदला जवन लोग सत्ता में अईले, उहो लोग जनता के आपस में लड़ावे लगले, नतीजा फेर 1991 में कांग्रेस के सरकार बन गईल।

नरेंद्र मोदी 2014 में 'अच्छे दिन' के वादा कईले अवुरी केंद्र में भाजपा के सरकार आईल। प्रधानमंत्री समृद्धि के सपना बेचले रहले, लेकिन समझ में नईखे आवत कि उ देश के राजनीतिक संस्कृति के हिन्दुत्व के ओर काहें मूडे देले?

हैरानी के बात बा कि ए पूरा मामला में जेकरा से सबसे जादे दोषी बतावल जाता - उ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ए बदलाव के पहिलही देख लेले रहे। कुछ दिन पहिले आगरा में भईल एगो बैठक में संघ निहोरा कईलस कि भाजपा दलित अवुरी महादलित के अपना खेमा में ले आवे खाती ए वर्ग तक पहुँच बनावे।

संघ के एही बात के असर बा कि भाजपा अवुरी प्रधानमंत्री के अंबेडकर में रुचि बढ़ गईल बा। लेकिन जब एक ओर 'हिन्दी, हिन्दू, हिंदुस्तान' के नारा लागता कि अंबेडकर के मूर्ति प माला चढ़ा के कतना फायदा होई? जदी तनिकों असर होईत त 2 अप्रैल के जवन भईल, तवन ना भईल रहीत।

आज के राजनीतिक हालत के देखत एक बात त साफ बा कि नरेंद्र मोदी जदी 2019 में हारतारे त एकजुट विपक्ष से जादे गाय-बैल वाली हिन्दुत्व के राजनीति अवुरी 'कट्टर हिन्दू समर्थक' एकरा खाती ज़िम्मेवार होईहे। आज राम मंदिर के बात त होखता, लेकिन 'सबका साथ, सबका विकास' मात्र नारा बनके रह गईल बा।

ए मौका प हम सिर्फ अतने कहल चाहब कि प्रधानमंत्री के 'कट्टर हिन्दू भक्त' अवुरी 'हिन्दुत्व ब्रिगेड' अपना कथनी-करनी से हिन्दू वोट के पक्का तौर नाश करता। हम मानतानी कि जदी 2019 के चुनाव में आज जईसन हालत रही त दलित अवुरी गरीब आदमी भाजपा के वोट ना दिही।

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