तनीए सा मिलते सहकि जाला केहु

तनीए सा मिलते सहकि जाला केहु

समय अईसने बा बहकि जाला केहु,
तनीए सा मिलते सहकि जाला केहु।

चाहला प तनिको मिलल ना जवन,
छनही में काहे बमकि जाला केहु।

बिधना के दिहल जे मोल ना बुझल,
उ अचके में जाने सनकि जाला केहु।

जवन मिलेला ओहके बचवले रहीं ,
जाने कहते में काहे पनकि जाला केहु।

काम रहले तक सभे रहे साथ में ,
काम होते पलक में सरकि जाला केहु।

एकदिन सटल रह ई कहियो देनी,
बात सुनते हुंमच के भड़कि जाला केहु।

अब त सुसुकि सुसुकि राहि चलत चलीं,
देखते हमके डगर में छरकि जाला केहु।

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देवेन्द्र कुमार राय
ग्राम: जमुआँव, पीरो,
भोजपुर, बिहार
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