'अरे ओ खदेरन को मदर, जब हम काबुल का मोर्चा में था नु...,' लोहा सिंह के भूलाईल त नईखी

पटना आकाशवाणी से प्रसारित होखेवाला नाटक 'लोहा सिंह' के गूंज चीन तक सुनाईल रहे।

पटना आकाशवाणी से प्रसारित होखेवाला नाटक 'लोहा सिंह' के गूंज चीन तक सुनाईल रहे।

एगो समय रहे जब एतवार के दिने सभ लोग आपन सभ काम फटाफट खतम क के अपना-अपना रेडियो से सट जात रहले। दोकानदार, गृहस्थ, मेहरारू समेत छोट-बड़ लईका-सयान, सभ केहु खाती सांझ के 6 बजे के समय बड़ा महत्व राखत रहे। हालत अयीसन होखत रहे कि 6 बजे से पांच मिनट पहिलही राह सुन्न-सपाट हो जात रहे।

एतना प्रयास एतवार के सांझ 6 बजे पटना आकाशवाणी से प्रसारित होखे वाला हास्य नाटक 'लोहा सिंह' खाती होखत रहे। बाद में ए नाटक के प्रसारण रोज होखे लागल। रेडियो ओ समय में पक्का समाजवादी रहे। तब रेडियो के पहुँच पढ़ल-लिखल, अनपढ़ , अमीर-गरीब समेत समाज के हर वर्ग तक रहे। इहे कारण रहे कि तब 'लोहा सिंह' के आवाज़ बिहार समेत देश-दुनिया तक तक पहुँच गईल।

रोहतास जिला के एगो साधारण आदमी अपना ए नाटक के माध्यम से दुनिया में मशहूर भईल अवुरी इतिहास में अपना नाम के दर्ज करा गईल। ए आदमी के नाम रहे रामेश्वर सिंह ‘कश्यप’। रामेश्वर सिंह अपना रेडियो नाटक 'लोहा सिंह' के चलते जासूसी आ बहादुरी के पहचान मानल जाए वाला 'शेरलॉक होम्स' आ 'जेम्स बांड' जईसन प्रसिद्ध भईले।

रामेश्वर सिंह 'कश्यप' के जन्म रोहतास जिला में सासाराम के नजदीक सेमरा गांव में 12 अगस्त 1927 के भइल। अंगरेजी सरकार के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (डीएसपी) राय बहादुर जानकी सिंह आ रामसखी देवी के बेटा रामेश्वर सिंह के पालन-पोषण बहुत लाड़-प्यार के संगे भईल। शुरुआती शिक्षा नवगछिया में भईल जबकि आगे के पढ़ाई इलाहाबाद में कईले।

सन 1948 में जब आकाशवाणी के पटना केंद्र के शुरुआत भईल त रामेश्वर सिंह 'चौपाल' कार्यक्रम में 'तपेसर भाई' के रूप में भाग लेवे लगलें। वार्ताकार, नाटककार, कहानीकार आ कवि के रूप में सैकड़ों रचना करेवाला रामेश्वर सिंह के लिखल भोजपुरी नाटक 'तसलवा तोर कि मोर' के प्रसारण पटना आकाशवाणी से शुरू भईल। ए नाटक में 'लोहा सिंह' नाम के एगो पात्र रहे, जवना के श्रोता बहुत पसंद कइले आ बहुत लोग चिट्ठी लिख के 'लोहा सिंह वाला नाटक' फेर से सुनवावे के मांग कईले।

लोहा सिंह के बढ़त लोकप्रियता के देखत रामेश्वर सिंह के मन में 'लोहा सिंह' नाटक के नींव पर गईल। रामेश्वर जी के खासियत रहे कि उनुका नाटक के पात्र हमेशा समाज से आवत रहले। कहल जाला कि रामेश्वर सिंह के घर के एगो नोकर के भाई रिटायर्ड फौजी रहे, जवन कि गलत-सलत अंग्रेज़ी, हिन्दी आ भोजपुरी के मसाला जईसन एके में फेंट के एगो नाया भाषा बोलत रहे। रामेश्वर सिंह के नोकर के इहे भाई असल में 'लोहा सिंह' रहे।

हिंदी-भोजपुरी क्षेत्र के लोग भलही आज रामेश्वर सिंह आ 'लोहा सिंह' के भूला गईल होखस लेकिन ए नाटक के एगो डायलॉग आजो ज़िंदा बा - "अरे ओ खदेरन को मदर, जब हम काबुल का मोर्चा में था नु..."।

नाटक 'लोहा सिंह में 'खदेरन को मदर' रहली प्रसिद्ध लोक गायिका प्रो. विन्ध्वासिनी देवी। हंसी अवुरी ठहाका के भरपूर डोज़ के बावजूद लोहा सिंह खाली हास्य नाटक ना रहे। इ नाटक ओ समय के सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनैतिक व्यवस्था प बरियार कटाक्ष रहे।

भारत-चीन के बीच भईल 1962 के लड़ाई से लवटल फौजी लोहा सिंह (प्रोफ़ेसर रामेश्वर सिंह ‘कश्यप’) जब 'फौजी बोली' में भोजपुरी मिला के अपना मेहरारू 'खदेरन को मदर' आ अपना दोस्त 'फाटक बाबा' (पाठक बाबा) के काबुल के मोर्चा के कहानी सुनावस त सुनेवाला हंसत–हंसत लोटिआए लागे। लेकिन एही नाटक में जब बाल विवाह, छूआछूत आ धर्म अवुरी जाति व्यवस्था प जोरदार प्रहार होखे त सुने वाला सोचे प मजबूर भी होखत रहले।

रामेश्वर सिंह 'कश्यप' के रचना 'लोहा सिंह' प शोध करेवाला डॉक्टर गुरुचरण सिंह बतावेलें कि – "इ नाटक देश के लोग में देशप्रेम आ राष्ट्रीय चेतना के भाव भरत रहे। रेडियो सेट बहुत कम रहे एहीसे पान के दोकान प ए नाटक के सुने खाती भीड़ लागत रहे। सीमा पर लड़ेवाला जवान के संगे-संगे आम जनता ए नाटक के सुन के भाव-विभोर हो जात रहे।"

हिन्दी के आलोचक डॉक्टर जीतेंद्र सहाय के लिखल एगो आलोचनात्मक निबंध - 'हास्य की आढ़ती’ में कहल बा, "चीन युद्ध के समय कश्यप (रामेश्वर सिंह) जी अपना ए नाटक के माध्यम से चीनी सेना के धज्जी उड़ावे शुरू कईले। रेडियो पीकिंग (चीन के सरकारी रेडियो) टिप्पणी कईले रहे कि जवाहरलाल (तत्कालीन प्रधानमंत्री) आकाशवाणी के पटना केन्द्र में एगो भईन्सा पोसले बाड़े, जवन कि चीन के देवार प सींग मारता।"

पद्मश्री, बिहार गौरव, बिहार रत्न जईसन सम्मान से सम्मानित आ देश के झकझोरे में माहिर प्रोफेसर रामेश्वर सिंह कश्यप निहन हास्य-व्यंग्य आ गंवई पात्र के गांछ अचानक 24 अक्तूबर, 1992 के गिर गईल। 'खदेरन को मदर' आ 'फाटक बाबा' के 'लोहा सिंह' हमेशा खाती हमनी के छोड़ गईले।

आज सासाराम में इनिका नाम प 'लोहा सिंह मार्ग' नाम के एगो सड़क बिया लेकिन डर सिर्फ ऐके बा कि ए सड़क प चलेवाला लोग असली 'लोहा सिंह' के भूला त ना जईहे?

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