28 अप्रैल 2026

विश्व सिनेमा का खौफ: रूह कंपा देने वाली टर्किश फिल्मों से लेकर शॉर्ट हॉरर का नया दौर

आजकल दुनिया भर के सिनेमा में डरावनी कहानियों का एक अलग ही क्रेज देखने को मिल रहा है। ‘द कॉन्ज्यूरिंग’ और ‘द नन’ जैसी हॉलीवुड की जानी-मानी फिल्मों के घिसे-पिटे प्लॉट से कई दर्शक अब ऊबने लगे हैं। ऐसे में अगर आप सच में खौफ का वो स्तर महसूस करना चाहते हैं जो आपकी आत्मा को झकझोर दे, तो आपको अपना दायरा थोड़ा बढ़ाना होगा। सिनेमा में डर की नई परिभाषा मुख्य रूप से दो मोर्चों पर लिखी जा रही है। पहला, टर्की की वो खौफनाक फिल्में जो जिन्न और पुराने श्रापों की बात करती हैं। और दूसरा, फिल्म फेस्टिवल्स में तहलका मचा रही शॉर्ट हॉरर फिल्में। आइए इन दोनों दुनियाओं की सबसे बेहतरीन पेशकशों पर नजर डालते हैं।

टर्किश हॉरर: वो कहानियां जो रातों की नींद छीन लें

टर्किश हॉरर फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत इनका मनोवैज्ञानिक डर और सस्पेंस है। ये फिल्में हॉलीवुड की तरह सिर्फ वीएफएक्स पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि इनकी कहानियां सीधे लोककथाओं और डरावने श्रापों से जुड़ी होती हैं।

काले जादू और भयानक कल्ट का साया कैन एवरेनोल के निर्देशन में बनी फिल्म ‘Baskin’ (2015) एक ऐसा ही तजुर्बा है जहां आपको एक मिनट के लिए भी पलक झपकाने का मौका नहीं मिलेगा। कहानी पुलिस अफसरों की एक टीम की है, जो एक अजीब कॉल का पीछा करते हुए एक पुरानी इमारत में जा पहुंचते हैं और वहां उनका सामना एक बेहद खतरनाक कल्ट से होता है। प्राइम वीडियो पर मौजूद 5.8 IMDb रेटिंग वाली इस फिल्म को देखकर किसी के भी पसीने छूट सकते हैं। इसी प्लैटफॉर्म पर अल्पर मेस्टसी की ‘Siccîn’ (2014) भी मौजूद है। 5.9 रेटिंग वाली यह फिल्म एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जो एक पुराने श्राप, काले जादू और घर में छिपे राजों से लड़ रहा है।

जिन्न और आत्माओं का खौफनाक जाल हसन कराकादाग एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने टर्किश हॉरर को एक नई पहचान दी है। उनकी फिल्म ‘Dabbe: The Possession’ (2013) में एक पत्रकार पैरानॉर्मल घटनाओं की जांच करते हुए एक भयानक जाल में फंस जाता है। सच्ची घटनाओं पर आधारित होने का दावा करने वाली इस फिल्म के जंप स्केयर्स कमाल के हैं। इसे नेटफ्लिक्स (IMDb: 6.8) पर देखा जा सकता है। इसी सीरीज की ‘Dabbe 4: Curse of the Jinn’ (2013, IMDb: 5.9) भी प्राचीन श्राप और जिन्नों से जूझते एक परिवार की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है, जो रियल लगने वाले सीन्स के कारण आपको अपने आस-पास किसी साये के होने का अहसास कराती है। वहीं, ‘Dabbe: Zehr-i Cin’ (2014) में एक श्रापित ताबीज के कारण सचाई और सपनों के बीच की लाइन धुंधली पड़ जाती है।

भूतिया घर और रहस्यमयी मौतें साल 2007 में आई अल्पर मेस्टसी की ‘Musallat’ (IMDb: 5.9) एक युवा जोड़े के भूतिया घर में शिफ्ट होने की कहानी है। फिल्म का सस्पेंस अंत तक दर्शक को बांधे रखता है। इसके अलावा 2008 की ‘SEMUM’ (IMDb: 5.0) में एक पत्रकार ऐसी रहस्यमयी मौतों की जांच करता है जो किसी बुरी आत्मा के साये में हुई हैं। रात के अंधेरे में इन फिल्मों को देखना किसी चुनौती से कम नहीं है।

खौफ का नया रूप: ओवरलुक फिल्म फेस्टिवल की शॉर्ट फिल्में

लंबे रनटाइम वाली टर्किश फिल्मों से इतर, अब डरावनी कहानियों का एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है। हाल ही में न्यू ऑरलियन्स में आयोजित ‘द ओवरलुक फिल्म फेस्टिवल’ ने साबित कर दिया है कि रूह कंपाने के लिए दो घंटे की जरूरत नहीं है।

शॉर्ट फिल्में इन दिनों हॉरर इंडस्ट्री की जान बन चुकी हैं। फेडे अल्वारेज़ और डेविड सैंडबर्ग जैसे बड़े डायरेक्टर्स ने इसी माध्यम से अपनी पहचान बनाई थी। यूट्यूब और वीमियो के कारण दर्शकों का एक ऐसा वफादार वर्ग तैयार हो गया है, जो इन छोटी फिल्मों के राज ढूंढने के लिए रेडिट पर लंबी बहसें करता है। इस साल फेस्टिवल में ‘फेरल’, ‘फ्रीकी’ और ‘स्टेटिक’ श्रेणियों में 26 शॉर्ट फिल्में दिखाई गईं, जिनमें से कुछ ने अपनी गहरी छाप छोड़ी है।

पुरानी मान्यताएं और पारिवारिक श्राप ‘फ्रीकी’ श्रेणी में डायरेक्टर जाहिल एडी की ‘Haint’ बेहद प्रभावशाली रही। कहानी एक गुल्ला गीची समुदाय की महिला, एनाबेल (मेलानी निकोल्स-किंग) की है। जब कुछ बाहरी लोग उनके इलाके पर कब्जा करने लगते हैं, तो वह अपने पूर्वजों की शक्तियों का आह्वान करती है, जिसके भयंकर परिणाम उन अनजान लोगों को भुगतने पड़ते हैं। दूसरी तरफ, जोसेफ बर्च की ‘Nail-Biter’ एक पारिवारिक श्राप की खौफनाक दास्तान है। अपने 18वें जन्मदिन पर एमी (एलेक्सा स्विंटन) अपनी मां की सख्त चेतावनियों के बावजूद नाखून चबाना नहीं छोड़ पाती। गोथिक रहस्य और अंधेरे कमरों में फिल्माई गई यह फिल्म एक शानदार क्लाइमेक्स देती है।

स्टीरियोटाइप तोड़ती कहानियां ‘फेरल’ श्रेणी की बात करें, तो हन्ना अलाइन की ‘Scissors’ स्लेशर फिल्मों के घिसे-पिटे पैटर्न को बड़ी चतुराई से पलट देती है। एक आदमी (एथन एम्ब्री) महिलाओं से अपनी नफरत के चलते एक बैचलरेट पार्टी में खून-खराबा करने पहुंचता है। वहां उसे पता चलता है कि सभी महिलाएं क्वीर हैं और कोई भी उसे गंभीरता से नहीं ले रहा है। इसी श्रेणी की ‘Man Eating Pussy’ (निर्देशक: ली लॉसन) बॉडी हॉरर का एक बेहतरीन उदाहरण है। एक बीमार बुजुर्ग व्यक्ति (जूलियन रिचिंग्स) एक रहस्यमयी सेक्स वर्कर (ग्रेस ग्लोविकी) के पास जाता है। फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स इसे फेस्टिवल की सबसे यादगार और अजीबोगरीब फिल्मों में से एक बनाते हैं।

अजीबोगरीब डर का अहसास ‘स्टेटिक’ श्रेणी में ‘Ghoststory’ (एलेक्स जैकब्स) बहुत ही सादे तरीके से डर पैदा करती है। एक पुराने वीएचएस टेप पर एक महिला बार-बार अपने बचपन के भूतिया अनुभव को अलग-अलग लहजे में सुनाने की कोशिश करती है। इस बीच एक धुंधला सा भूत कैमरे की तरफ बढ़ता दिखाई देता है। जो बात अनकही रह जाती है, वही असल में सबसे ज्यादा डराती है। इसी श्रेणी में क्रिश्चियन हेड्के की ‘Superconscious’ 1970 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यहां सिबिल (नथाली बोल्ट) और हार्वे (मैट ओल्सन) नाम के दो किरदार एक वैज्ञानिक प्रयोग के लिए मानव क्षमता केंद्र में पहुंचते हैं, जहां चीजें एक बहुत ही डरावना और अप्रत्याशित मोड़ ले लेती हैं।